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Iran War : ईरान में जारी जंग के बीच एक ऐसा शहर काफी सुर्खियां बंटोर रहा है जहां पर हिंदुओं की अच्छी-खासी संख्या है. इस शहर में भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का मिश्रण झलकता है और लोग त्योहार भी काफी खुशी से मनाते हैं.
4 अप्रैल 2026
ईरान युद्ध: जब हम ईरान की बात करते हैं तो एक इस्लामिक देश की छवि हमारी आंखों के सामने घूमने लग जाती है. लेकिन इस देश में एक ऐसा भी शहर है जहां पर बहुल संख्या हिंदुओं की है और वह बीते कई सालों से यहां पर रहता आ रहा है. इस शहर का नाम है ‘बंदर अब्बास’, जो ईरान का एक प्रमुख बंदरगाह भी है और अपनी सांस्कृतिक विविधता का केंद्र भी माना जाता है. यह शहर फारस की किनारे पर बसा हुआ है और यह व्यापार के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. साथ ही आने वाले समय में व्यापार का केंद्र होने की वजह से अमेरिका और इजरायल के निशाने पर भी आ सकता है. बता दें कि प्राचीन काल से ही भारत और ईरान के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक रिश्ते बने हुए हैं और यही वजह है कि यहां पर हिंदुओं की संख्या अच्छी खासी है.
कैसे पहुंचे यहां पर हिंदू?
भारतीय व्यापारी खासकर गुजरात और सिंध इलाके से यहां पर ट्रेड करने के लिए आए थे और फिर यही पर बस गए. फिर समय बीतने के साथ एक छोटी लेकिन एक मजबूत सोसायटी खड़ी कर ली. अब यहां पर इन लोगों को रहते सालों हो गए हैं. साथ ही अपनी परंपरा और धर्म को भी संभालकर रखे हुए हैं.
कई मंदिर भी हैं मौजूद
बंदर अब्बास शहर में कई सारे मंदिर भी हैं जहां पर हिंदू समाज के लोगों पूजा अर्चना करने के लिए जाते हैं. इन मंदिरों में भारतीय कला और परंपरा की झलक साफ-साफ झलकती है. इसके अलावा यहां पर हिंदू समुदाय के लोग इकट्ठा होकर त्योहार भी मनाते हैं और पूजा अर्चना भी करते हैं. भले ही हिंदुओं की संख्या वहां पर कम है लेकिन इसके बाद भी अपनी परंपरा को मजबूती से थामे हुए हैं.
सांस्कृतिक विविधता से बना मजबूत शहर
इस शहर की खास बात यह है कि यहां पर सांस्कृतिक विविधिता है. हिंदू समुदाय के लोग स्थानीय लोगों के साथ मिलजुलकर रहते हैं और उनके साथ त्योहारों को भी सेलेब्रेट करते हैं. साथ ही भाषा, खान-पान और संस्कृति का भी कमाल का मिश्रण है. हालांकि, हिंदुओं की संख्या ज्यादा बड़ी नहीं है इसके बाद भी वह उनमें भारतीय संस्कृति का टच जरूर है.
130 साल पुराना मंदिर आज भी स्थिर
1892 में बनाया गया ये मंदिर एक बड़ा सांस्कृतिक केंद्र है. यह वह दौर था जब अब्बास व्यापारिक गतिविधियों में तेजी से आगे बढ़ रहा था और भारतीय समुदाय भी मजबूत स्थिति में था. करीब 130 साल पहले बना यह टेंपल आज भी मूल संरचना में खड़ा है और उस समय की सांस्कृतिक जीवनशैली की झलक दे रहा है. साथ ही इसके निर्माण में उस समय के शासक मोहम्मद हसन खान सद-ओल-मलेक के शासनकाल का भी जिक्र है, जो उस समय प्रशासनिक प्रमुख भी हुआ करते थे.
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