12
MBBS Admission: खेल कोटे में बदलाव किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट पंजाब सरकार पर भड़क गया. कहा कि बीच सत्र में मानदंडों में लचीलापन भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देता है.
एमबीबीएस प्रवेश: खेल कोटे में बदलाव किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट पंजाब सरकार पर भड़क गया. कहा कि बीच सत्र में मानदंडों में लचीलापन भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देता है. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पंजाब सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि उसने सत्र 2024 में खेल कोटा के तहत MBBS और BDS पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए लचीली प्रक्रिया अपनाई है. कोर्ट ने कहा कि एक बार प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश मानदंडों में बदलाव नहीं किया जा सकता. जस्टिस संजय कुमार और आलोक आराधे की बेंच ने कहा कि जिस तरह भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद भर्ती मानदंडों में संशोधन करना कानूनन वर्जित है, उसी तरह प्रवेश प्रक्रिया को शुरू होने से पहले पूरी तरह से परिभाषित न करना भी उतना ही गैरकानूनी है ताकि संबंधित अधिकारियों को बाद में अपने हितों के अनुरूप मानदंड निर्धारित करने या भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने का मौका न मिले. अदालत ने कहा कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने और मनमानी को रोकने के लिए ऐसी प्रक्रिया में पारदर्शिता सर्वोपरि है.
मनमानी से भाई-भतीजावाद को बढ़ावा
पीठ ने कहा कि शुरुआत में पारदर्शिता की कमी से मनमानी और भाई-भतीजावाद को परोक्ष रूप से प्रवेश करने का अवसर मिलता है, जो एक समतावादी राज्य के लिए अपरिहार्य है. शीर्ष अदालत सत्र 2024 में खेल कोटा के तहत MBBS और BDS पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए पंजाब सरकार द्वारा अपनाए गए प्रवेश मानदंडों के खिलाफ दिवजोत सेखों और शुभकर्मन सिंह द्वारा दायर अपीलों की सुनवाई कर रही थी. अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत राज्य और उसके संस्थानों का यह कर्तव्य और दायित्व है कि वे निष्पक्ष और तर्कसंगत तरीके से कार्य करें. राज्य द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय तर्कसंगत होना चाहिए, मनमाना नहीं. जब कोई कार्य जल्दबाजी में किया जाता है, तो दुर्भावना मानी जाती है. यह कानून में क्षमा योग्य नहीं है.
पंजाब सरकार के तर्कों को किया खारिज
कहा कि यह सिद्धांत MBBS और BDS जैसे लोकप्रिय पाठ्यक्रमों से संबंधित प्रवेश प्रक्रिया पर भी समान रूप से लागू होता है. अदालत ने निर्देश दिया कि सेखों और सिंह को सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीटें दी जाएं. पीठ ने कहा कि हालांकि पंजाब सरकार अपने इस तर्क के समर्थन में कानूनी मिसालों का हवाला देना चाहेगी कि अदालत आम तौर पर नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती, लेकिन यह भी सर्वविदित है कि जब कोई नीतिगत निर्णय मनमानी से भरा हो या मनमानी के लिए रास्ते खोलता हो, तो अदालत उसे रद्द करने के लिए न्यायसंगत होगी.अदालत ने कहा कि नीति निर्माता को नीति बनाने में कुछ छूट देना मनमानी या भाई-भतीजावाद की अनुमति देने के बराबर नहीं है. इसलिए हमें पंजाब सरकार के तर्कों में कोई दम नहीं दिखता.
ये भी पढ़ेंः टेंडर नीति के खिलाफ मानवाधिकार आयोग ने मांगा स्पष्टीकरण, रेलवे बोर्ड अध्यक्ष को भेजा नोटिस
