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क्या भारत झेल पाएगा AI की प्यास

by Live India
क्या भारत झेल पाएगा AI की प्यास

एआई डेटा सेंटर: आज का जमाना एआई का है. जब भी आपके मन में कोई सवाल आता है, तो आप झट से अपना फोन निकालते हैं और चैटजीपीटी या एआई से पूछ लेते हैं. ग्राफ बनवाना हो या डेटा को एनालाइस करना, लव एडवाइस हो या करियर गाइडेंस, इमेज क्रिएट करवानी हो या वीडियो बनवानी हो, सब कुछ सिर्फ कुछ सेंकड में आपके सामने आ जाता है. एआई ने हम सभी की जिंदगियां इतनी आसान बना दी है कि हम बिना किसी मेहनत के सिर्फ एक क्लिक में कुछ भी पता कर सकते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके फोन में जैटजीपीटी या जैमिनी जैसे एआई टूल्स किस तरह काम करते हैं. इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि एआई टूल्स एआई डेटा सेंटर्स से चलते हैं. आप इस तरह से समझ सकते हैं कि आपके फोन में एआई टूल सिर्फ एक चेहरा है और उसका दिमाग डेटा सेंटर्स हैं.

डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए अरबों गैलन पानी की जरूरत होती है. वहीं पानी जिसे बचाने के बारे में हम सभी ने बचपन से सुनते आए हैं. इस साल भारत में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ में गूगल ने भारत में मेगा एआई प्रजेक्ट डील की घोषणा की है. यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में तैयार हो रहा है. इसको लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है. गूगल का यह नया डेटा सेंटर भारत के डिजिटल विकास के लिए भले ही अहम है, लेकिन क्या इसके पानी की खपत को हम पूरा कर सकते हैं.

एआई पी रहा अरबों गैलन पानी

गूगल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उसके डेटा सेंटर्स ने साल 2023 में दुनियाभर में 6.1 बिलियन गैलन यानी 6.1 अरब गैलन पानी कंज्यूम किया. यह खपत पिछले साल के मुकाबले 17 प्रतिशत ज्यादा है. इतने पानी का मतलब है कि कई एकड़ खेतों को पूरे साल सींचा जा सकता है और करोड़ों लोगों को पूरे साल पानी पिलाया जा सकता है. ऐसे में यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि दुनिया में बढ़ते एआई डेटा सेंटर्स आने वाले समय में पानी की नई किल्लत पैदा कर सकते हैं.

विशाखापत्तनम में प्रस्तावित गूगल डेटा सेंटर भारत में किसी अमेरिकी टेक कंपनी का पहला बड़ा AI-फोकस्ड डेटा सेंटर हब है, जो 600 एकड़ में फैला होगा. गूगल के मेगा प्रोजेक्ट में फुल-स्टैक एआई इसोसिस्टम बनाया जाएगा, जिसका एक हिस्सा है 1000 मेगावॉट का विशाल डेटा सेंटर बनाना. स्थानीय लोगों का कहना है कि शहर पहले से जल संकट से जूझ रहा है. ऐसे में इस प्रोजेक्ट से लोगों के ऊपर भारी संकट आ जाएगा. चलिए समझते हैं गूगल का यह एआई डेटा सेंटर सालाना कितना पानी कंज्यूम करेगा और इससे कितने लोगों की प्यास बुझ सकती है.

हर रोज करोड़ों लीटर पानी पीएगा गूगल का डेटा सेंटर

अगर Google जैसे किसी बड़े AI प्रोजेक्ट के लिए 1,000 मेगावाट (1 गीगावाट) क्षमता वाला कोई डेटा सेंटर बनाया जाए, तो उसकी पानी की जरूरतें चौंकाने वाली होंगी. डेलॉइट इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 1MW का डेटा सेंटर हर दिन करीब 68,500 लीटर पानी को कंज्यूम करता है. इस हिसाब से अनुमान लगाया जाए, तो 1,000 मेगावाट का डेटा सेंटर 7 करोड़ से 12 करोड़ लीटर तक पानी इस्तेमाल कर सकता है. सालाना आधार पर, यह खपत लगभग 26 अरब से 44 अरब लीटर पानी के बराबर होगी.

कितने लोगों की जरूरत हो सकती है पूरी

इतने पानी की खपत की गंभीरता को समझने के लिए जानें कि यह कितने लोगों की प्यास बुझा सकता है. एक आम इंसान को पीने के लिए रोजाना लगभग 2 लीटर पानी की जरूरत होती है. इस हिसाब से, 7 करोड़ लीटर पानी लगभग 3.5 करोड़ लोगों की रोजाना की प्यास बुझा सकता है, जबकि 12 करोड़ लीटर पानी 6 करोड़ लोगों की रोजाना पीने के पानी की जरूरत के बराबर है.

घरेलू इस्तेमाल के नजरिए से देखें, तो भारत में एक आम इंसान रोजाना लगभग 135 लीटर पानी का इस्तेमाल करता है. इस हिसाब से, 7 करोड़ लीटर पानी लगभग 518,000 लोगों की घरेलू जरूरतों को रोजाना पूरा कर सकता है, जबकि 12 करोड़ लीटर पानी लगभग 888,000 लोगों के रोजाना के इस्तेमाल के बराबर है. दूसरे शब्दों में, एक अकेला बड़ा AI डेटा सेंटर एक ही दिन में उतना पानी इस्तेमाल कर सकता है जितना कि कोई मध्यम आकार का शहर.

भारत में पहले से चल रहे 1500 MW के डेटा सेंटर

पीआईबी प्रेस रिलीज के मुताबिक, भारत की कुल एआई डेटा सेंटर की क्षमता 1,500 MW तक पहुंच गई है. यानी हर साल भारत के डेटा सेंटर्स सालाना पानी की खपत कम से कम 3,750 करोड़ लीटर है. रोजाना, भारत में ये डेटा सेंटर्स लगभग 102.7 मिलियन लीटर से 410 मिलियन लीटर पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं.

इंडस्ट्री स्टैंडर्ड्स के अनुसार, 1500 MW कैपेसिटी के लिए रोजाना लगभग 10.2 करोड़ लीटर से ज्यादा है. लेकिन, मोर्डोर इंटेलिजेंस और एनवायरनमेंटल रिपोर्ट के मुताबिक, बहुत ज्यादा गर्मी और AI लोड की वजह से कई बड़े हाइपरस्केल डेटा सेंटर में, पानी की खपत रोजाना दोगुना तक बढ़ गई है. इस भारी खपत को कम करने के लिए, इंडस्ट्री डायरेक्ट-टू-चिप लिक्विड कूलिंग, एडियाबेटिक कूलिंग और इमर्शन कूलिंग जैसी एडवांस्ड कूलिंग टेक्नोलॉजी अपना रही है. इंडस्ट्री हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग और AI वर्कलोड को अच्छे से सपोर्ट करने के लिए हाई डेंसिटी रैक भी लगा रही है, ताकि बिजली और पानी की खपत और कम हो सके.

भारत में केवल इतना है पानी

भारत पहले से ही पानी के गंभीर संकट से जूझ रहा है. भारत में दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन हमारे पास दुनिया के ताजे पानी के संसाधनों का केवल लगभग 4 प्रतिशत ही है. NITI Aayog की रिपोर्टों के अनुसार, देश के कई बड़े शहरों में भूजल स्तर में लगातार गिरावट देखी जा रही है. गर्मियों के महीनों में, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों में पानी की कमी की खबरें आम बात हो गई हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि जहां AI डेटा सेंटर सीधे तौर पर पीने के पानी की आपूर्ति को खत्म नहीं कर सकते हैं, वहीं पानी की कमी वाले क्षेत्रों में उन्हें लगाने से स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव पड़ेगा और समय के साथ भारी कमी भी हो सकती है.

डेटा सेंटर्स में क्यों इस्तेमाल होता है पानी ?

AI डेटा सेंटर में हजारों पावरफ़ुल GPU (ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट) और TPU लगे होते हैं. ये प्रोसेसर आम कंप्यूटर से कई गुना तेज़ी से काम करते हैं, और चौबीसों घंटे चलते हैं. इससे बहुत ज्यादा गर्मी पैदा होती है, जैसे कोई बड़ा इंडस्ट्रियल हीटर. अगर यह गर्मी जल्दी खत्म नहीं होती है, तो सर्वर ज्यादा गरम हो जाएंगे, जल जाएंगे, या काम करना बंद भी कर देंगे. इसलिए इन सिस्टम को ठंडा करने के लिए बहुत ज़्यादा पानी का इस्तेमाल होता है. AI डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाला 80% पानी भाप बनकर हवा में उड़ जाता है, जिससे वह रीसायकल भी नहीं हो पाता. सबसे जरूरी बात यह है कि इन सेंटेर्स को ठंडा रखने के लिए सिर्फ साफ फिल्टर्ड पानी का ही इस्तेमाल करना पड़ता है. चलिए जानते हैं क्यों.

AI डेटा सेंटर में साफ पानी का इस्तेमाल क्यों किया जाता है?

एआई से एक सवाल पूछने पर कितना पानी खर्च होता है.

एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, जब आप चैटजीपीटी या जैमिनि से 10 से 15 आम सवाल पूछते हैं तो लगभग 500 मिलिलीटर पानी खर्च होने का अनुमान लगाया गया है. इसका मतलब है कि आपके हर सवाल पर लगभग 50 मिलिलीटर पानी खर्च हो जाता हैं. वहीं, अगर आप AI से 100 शब्दों का ईमेल लिखने या कोई बड़ा काम करने को कहते हैं, तो सर्वर पर बढ़े हुए प्रेशर की वजह से एक बार में 519 मिलिलीटर तक पानी खर्च हो सकता है.

AI को भविष्य की सबसे जरूरी टेक्नोलॉजी में से एक माना जा रहा है और भारत भी इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है. हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि डेटा सेंटर्स को बढ़ाने से पानी, बिजली और पर्यावरण के संसाधनों पर पड़ने वाले असर पर गंभीरता से सोचना होगा. विशाखापत्तनम में गूगल के AI डेटा सेंटर को लेकर उठाए गए सवाल इस बात की याद दिलाते हैं कि आने वाले सालों में डिजिटल डेवलपमेंट और प्राकृतिक संसाधनों के बीच बैलेंस बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हो सकता है.

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