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फिल्म की पूरी कहानी कहते हैं गहने

by Live India
फिल्म की पूरी कहानी कहते हैं गहने

Life of Indian Jewellery: भारत में गहनों की एक अलग ही चमक है. गले के मंगलसूत्र से लेकर पैर की पायल तक की अलग खासियत होती है. ऐसे ही हमारी फिल्मों में भी इन गहनों का बहुत बड़ा कद है.

24 जनवरी, 2026

भारतीय सिनेमा में अगर हीरो-हीरोइन जान हैं, तो गहने उन किरदारों की धड़कन है. आपने कई बार देखा होगा कि पर्दे पर पायल की एक हल्की सी आहट ही बता देती है कि आने वाला कैरेक्टर कौन होगा. पायल की झंकार बता देती है कि कोई चुलबुली हसीना आने वाली है या कोई डरी हुई रूह या फिर गुस्से से भरी गर्लफ्रेंड. यही वजह है कि फिल्मों में गहने सिर्फ सजने-संवरने की चीज नहीं रहे, बल्कि ये प्यार, धोखे, मजबूरी और बगावत की जीती-जागती कहानियां सुनाते हैं.

पायल की खनक

इंडियन सिनेमा इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि गहनों का शोर इमोशन्स को कैसे दिखाता है. साल 2018 में रिलीज़ हुई हॉरर थ्रिलर फिल्म ‘तुंबाड’ में पायल की आवाज किसी के आने से पहले ही खौफ पैदा कर देती है. वहीं साल 1981 में रिलीज़ हुई रेखा की ‘उमराव जान’ में जब नवाब सुल्तान उमराव की शायरी में खोकर अपना हार उनके कदमों में रख देते हैं, तो वो हार सिर्फ एक तोहफा नहीं, बल्कि प्यार का सिंबल बन जाता है.

गहनों का बिकना

भारतीय फिल्मों में मंगलसूत्र का टूटना सिर्फ एक धागा टूटना नहीं, बल्कि एक रिश्ते के बिखरने का सबसे बड़ा ड्रामा माना जाता है. बॉलीवुड की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘मदर इंडिया’ से लेकर आज की मेलोड्रामा फिल्मों में, जब एक मां घर चलाने के लिए अपने कंगन या चेन गिरवी रखती है, तो वो गहना स्ट्रगल की एक नई कहानी लिखता है. वैसे, गहनों की भी अपनी अलग इमेज है. कभी ये स्त्रीधन या लड़की का अधिकार होते हैं, तो कभी दहेज के रूप में बोझ बन जाते हैं.

किरदार की पहचान

आजकल की फिल्मों में गहने किरदार की पर्सनैलिटी को बोलने से पहले ही बयां कर देते हैं. साल 2023 में रिलीज़ हुई रणवीर सिंह और आलिया भट्ट की फिल्म ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ को ही देख लीजिए. रॉकी एक बिंदास पंजाबी मुंडा है जो भारी चेन और बड़ी अंगूठियां पहनता है. वहीं, रानी एक तेज-तर्रार जर्नलिस्ट है जो खूबसूरत नोज़पिन और शिफॉन की साड़ियों का शौक रखती है. इसी तरह संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में नथ उतारने की रस्म मासूमियत के छिनने का सिंबल बन जाती है, जिसे बाद में गंगूबाई अपनी शान का हिस्सा बना लेती है.

वक्त का धागा

वैसे, ये गहने कभी-कभी सालों का फासला मिटा देते हैं. साल 2004 में रिलीज़ हुई शाहरुख खान और प्रीति जिंटा की फिल्म ‘वीर-ज़ारा’ का वो सीन आपको याद होगा, जब सालों बाद वीर जेल से बाहर आता है और अपनी जेब से वो पायल निकालता है जो उसने संभाल कर रखी थी. जब वो ज़ारा के पैर में उसे बांधने के लिए झुकता है, तो ज़ारा अपना पैर दिखाकर बताती है, कि इस पायल की जोड़ी उसने पहनी हुई है. बिना एक शब्द बोले, उन दो पायलों ने वीर और जारा के मिलने की अधूरी कहानी पूरी कर दी.

बदलता दौर

हालांकि, आज के दौर में जूलरी का मतलब पूरी तरह से बदल चुका है. दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘पिकू’ में दीपिका का कैरेक्टर कोई जूलरी नहीं पहनता. पीकू का स्टाइल उसकी आजादी और सादगी को दिखाता है. वहीं, ‘सास बहू और फ्लेमिंगो’ जैसे टीवी सीरियल और वेब सीरीज में लड़कियां हमेशा हैवी कंगन और ऑक्सीडाइज्ड जूलरी को एक हथियार की तरह पहनती हैं, जो उनके बागी तेवर को दिखाते हैं.

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