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न्यायाधिकरण ने पिछले साल अलीगढ़ में एक सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल के परिवार को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है.
मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण: सड़क हादसे में जान गंवाने वाले कांस्टेबल के परिवार को बड़ी राहत मिली है. न्यायाधिकरण ने पिछले साल अलीगढ़ में एक सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल के परिवार को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है. बीमा कंपनी को पूर्ण मुआवजा राशि का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी ठहराते हुए न्यायाधिकरण ने पाया कि दुर्घटना की तारीख पर संबंधित वाहन का बीमा था और बीमा कंपनी कोई बचाव साबित करने में विफल रही. दिल्ली स्थित मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण की पीठासीन अधिकारी पूजा अग्रवाल हादसे में मारे गए दिनेश कुमार की पत्नी, माता-पिता और नाबालिग बच्चों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थीं. 13 जनवरी 2024 की सुबह दिनेश कुमार अपनी मोटरसाइकिल से ड्यूटी से घर लौट रहे थे, तभी मथुरा बाईपास फ्लाईओवर पर एक तेज रफ्तार कार ने उनकी मोटरसाइकिल को पीछे से टक्कर मार दी. वे जमीन पर गिर गए, जिससे उन्हें चोटें आईं. उन्हें अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.
बीमा कंपनी ने कहा- झूठा फंसाया
न्यायाधिकरण ने 19 जनवरी को अपने फैसले में एक प्रत्यक्षदर्शी की गवाही और पुलिस चार्जशीट पर भरोसा करते हुए कहा कि संभावना की प्रबलता के आधार पर याचिकाकर्ताओं ने अपना दायित्व सिद्ध कर दिया है और यह साबित कर दिया है कि मृतक दिनेश कुमार को 13 जनवरी को हुई दुर्घटना में घातक चोटें आईं, जिसमें प्रतिवादी द्वारा संचालित वाहन शामिल था. बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि दोषी वाहन चालक को झूठा फंसाया गया था क्योंकि प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में उसका वाहन नंबर शुरू में दर्ज नहीं था. अदालत में एक प्रत्यक्षदर्शी का बयान भी काफी बाद में दर्ज किया गया था. न्यायाधिकरण ने इसका खंडन करते हुए कहा कि केवल इस तथ्य से कि शुरू में एफआईआर एक अज्ञात वाहन के खिलाफ दर्ज की गई थी, दोषी वाहन की संलिप्तता को गलत साबित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि एफआईआर सभी तथ्यों का संकलन नहीं होती है. यदि जांच के दौरान जांच अधिकारी द्वारा दोषी वाहन की पहचान सहित कुछ तथ्य सामने आते हैं, तो उसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है कि वे एफआईआर में उल्लिखित नहीं हैं.
हादसे में मृतक की लापरवाही नहीं
न्यायाधिकरण ने यह भी गौर किया कि न तो चालक और न ही दुर्घटना में शामिल वाहन के मालिक ने मामले के तथ्यों का खंडन करने या अपना बचाव प्रस्तुत करने के लिए गवाह के रूप में पेश हुए. न्यायाधिकरण ने कहा कि इस बात का कोई संकेत तक नहीं है कि दुर्घटना मृतक की किसी गलती या लापरवाही के कारण हुई थी. रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, यहां तक कि इस बात का भी संकेत नहीं है कि दुर्घटना मृतक की किसी लापरवाही या जल्दबाजी के कारण हुई थी. न्यायाधिकरण ने यह भी पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण “मृत्यु से पहले लगी चोटों के कारण रक्तस्रावी आघात” दर्ज किया गया था, जो सड़क दुर्घटना में लगी चोटों के अनुरूप है. कुमार की आयु केवल 37 वर्ष थी. वे परिवार के एकमात्र कमाने वाले थे और दुर्घटना के समय उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए न्यायाधिकरण ने विभिन्न मदों के तहत 1 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा दिया, जिसमें आश्रितों की हानि के लिए 97.38 लाख रुपये शामिल है.
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