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Tea Industry: बढ़ती लागत, स्थिर कीमत और श्रम की कमी के कारण भारत का चाय उद्योग वित्तीय संकट से गुजर रहा है. जिससे बागान मालिकों काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.
चाय उद्योग: बढ़ती लागत, स्थिर कीमत और श्रम की कमी के कारण भारत का चाय उद्योग वित्तीय संकट से गुजर रहा है. जिससे बागान मालिकों काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. कई बागानों को लागत मूल्य से कम पर चाय बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे कर्ज के साथ-साथ वित्तीय दबाव बढ़ रहा है.भारतीय चाय संघ की उत्तर बंगाल शाखा के अध्यक्ष उत्तम चक्रवर्ती ने कहा कि जब तक हम उच्च गुणवत्ता वाली चाय का उत्पादन नहीं करते और लाभकारी मूल्य प्राप्त नहीं करते, तब तक टिकाऊपन असंभव है. उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में उर्वरकों, कोयले, कीटनाशकों और बिजली की लागत में तेजी से वृद्धि हुई है. अकेले बिजली का खर्च लगभग 10-11 रुपये प्रति किलोग्राम तैयार चाय तक पहुंच गया है. संघ की अध्यक्ष शैलजा मेहता ने कहा कि उद्योग लागत वृद्धि और मूल्य वृद्धि के बीच दीर्घकालिक असंतुलन से जूझ रहा है.
कर्ज के बोझ तले दबे उत्पादक
उन्होंने कहा कि उत्पादन लागत और मूल्य प्राप्ति के बीच सामंजस्य स्थापित करना महत्वपूर्ण है. उन्होंने हाल ही में उत्तर बंगाल चैप्टर की वार्षिक आम बैठक में इस क्षेत्र के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डाला और कहा कि पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में लगभग 32 लाख परिवार चाय उद्योग पर निर्भर हैं. उद्योग जगत के अधिकारियों ने कहा कि श्रम की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन गई है. कुछ बागानों में उत्पादन के चरम समय में 25-50 प्रतिशत तक अनुपस्थिति दर्ज की गई है, जिसके कारण उन्हें अधिक लागत पर बाहरी श्रम पर निर्भर रहना पड़ रहा है. अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान और कीटों के प्रकोप सहित जलवायु परिवर्तनशीलता से उपज और गुणवत्ता पर और भी बुरा असर पड़ रहा है. बागान मालिकों ने भारतीय चाय बोर्ड से लंबित सब्सिडी के शीघ्र भुगतान, विशेष चाय उत्पादन तथा मशीनरी उन्नयन के लिए वित्तीय प्रोत्साहन की मांग की है.
लाखों रोजगारों पर खतरा
उद्योग जगत संगठित चाय उत्पादकों को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की योजनाओं का लाभ उठाने की अनुमति देने की भी मांग कर रहा है. उनका तर्क है कि चाय की खेती मूल रूप से कृषि से संबंधित है. उद्योग संघ ने ऊर्जा लागत कम करने के लिए पश्चिम बंगाल विद्युत नियामक आयोग द्वारा अधिसूचित सौर ऊर्जा प्रावधानों को कम करने और शीघ्र लागू करने की भी मांग की है. हितधारकों ने कहा कि सस्ते आयात और मिश्रित चाय को भारतीय मूल का बताकर गलत तरीके से लेबल लगाने से घरेलू उत्पादकों को नुकसान हो रहा है. उन्होंने गुणवत्ता मानकों और निर्यात विश्वसनीयता की रक्षा के लिए कड़ी निगरानी की मांग की. भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है और यह क्षेत्र प्रत्यक्ष रूप से 10 लाख से अधिक श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है.
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