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Supreme Court: न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के 2019 के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक बैंक कर्मचारी को सभी सेवानिवृत्ति लाभ देने का निर्देश दिया गया था.
सुप्रीम कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) केवल नौकरी छोड़ना नहीं है, बल्कि यह सेवा की निर्धारित अवधि पूरी करने वाले कर्मचारी का एक ‘विशिष्ट कानूनी अधिकार’ है. न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के 2019 के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक बैंक कर्मचारी को सभी सेवानिवृत्ति लाभ देने का निर्देश दिया गया था. यह मामला एक बैंक प्रबंधक से जुड़ा है. उन्होंने अक्टूबर 2010 में तीन महीने के नोटिस के साथ स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) की अर्जी दी थी. नोटिस अवधि पूरी होने के बाद मई 2011 में उन्होंने काम करना बंद कर दिया.
बैंक ने कर दिया था बर्खास्त
दिलचस्प बात यह है कि उनके पद छोड़ने के आठ महीने बाद मार्च 2012 में बैंक ने उन पर संदिग्ध लेनदेन के आरोप में चार्जशीट दाखिल की और बाद में उन्हें बर्खास्त कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने बैंक की अपील खारिज करते हुए कहा कि चूंकि कर्मचारी ने अपनी सेवा के आवश्यक वर्ष पूरे कर लिए थे, इसलिए नियमानुसार नोटिस अवधि समाप्त होते ही उन्हें सेवानिवृत्त माना जाना चाहिए. कोर्ट ने जोर दिया कि बैंक द्वारा सेवानिवृत्ति स्वीकार न करना और बाद में जांच शुरू कर बर्खास्त करना अनुचित था. इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कर्मचारी पात्रता मानदंडों को पूरा करता है तो प्रबंधन बिना ठोस आधार के उसके VRS के अधिकार को नहीं छीन सकता.
पीठ ने नोटिस पीरियड को माना सही
अपील को निपटाते समय पीठ ने पेंशन और सेवा नियमों के प्रासंगिक प्रावधानों का उल्लेख किया. पीठ ने कहा कि यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि कोई कर्मचारी 1 नवंबर 1993 को या उसके बाद 20 साल की योग्यता सेवा पूरी करता है, और नियुक्ति प्राधिकारी को कम से कम तीन महीने का नोटिस देता है, तो वह स्वेच्छा से सेवानिवृत्त हो सकता है. स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त होने के लिए तीन महीने की मोहलत 4 अक्टूबर, 2010 को दी गई थी और यह अवधि 4 जनवरी, 2011 को समाप्त होनी थी, जिसे नोटिस अवधि के भीतर अस्वीकार करने का आदेश नहीं दिया गया था.
कर्मचारी के पक्ष में फैसला
पीठ ने कहा कि नोटिस अवधि की समाप्ति और काम बंद करने के बाद 29 जून, 2011 को सूचित की गई गैरअनुमोदन का कोई फायदा नहीं हुआ. इसमें कहा गया है कि 11 नवंबर, 2010 को बैंक द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, लेकिन यह अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने के इरादे को नहीं दर्शाता है. फिर भी, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति केवल नौकरी छोड़ने या बंद करने का कार्य नहीं है, बल्कि यह एक कर्मचारी का एक अलग अधिकार है जो सेवा के अपेक्षित वर्षों के पूरा होने पर मिलता है. पीठ ने कहा कि आरोप पत्र जारी करने और बर्खास्तगी आदेश जारी करने का कार्य भी कानून में उचित नहीं था. पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार, कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद के सभी परिणामी लाभों का हकदार होगा. उसने बैंक को लागू ब्याज के साथ तीन महीने के भीतर सभी बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया.
समाचार स्रोत: पीटीआई
