82
केन-बेतवा लिंक परियोजना का विरोध: विकास की चमक के पीछे विनाश और आंसुओं की एक ऐसी कहानी मध्य प्रदेश के पन्ना जिले से सामने आई है, जो किसी का भी कलेजा कंपा दें. देश की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना, मझगांय, रूंझ, नेगुवा और एनटीपीसी परियोजनाओं के कारण अपनी जमीन खो चुके आदिवासी और किसान पिछले छह दिनों से उफनती नदी के बीच जल सत्याग्रह पर बैठे हैं. इस आंदोलन को नाम दिया गया है चिता आंदोलन. तेज बारिश और गले तक आते मटमैले पानी के बीच ये विस्थापित सिर्फ अपना हक, उचित मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास मांग रहे हैं. लेकिन प्रशासन की बेरुखी इस कदर है कि आरोप लग रहे हैं कि आंदोलन स्थल पर पीने का साफ पानी तक बंद करवा दिया गया है.
सम्मानजनक पनर्वास की मांग
‘अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’ और ‘भारत माता की जय’ के नारों से पन्ना की यह उफनती नदी गूंज रही है. जय किसान संगठन के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर के नेतृत्व में यहां आमरण अनशन, मिट्टी सत्याग्रह और जल सत्याग्रह का आज छठा दिन है. तस्वीरें गवाह हैं कि सिस्टम की बेरुखी के आगे ये विस्थापित झुकने को तैयार नहीं हैं. मूसलाधार बारिश के बावजूद पुरुष गले तक पानी में डूबे हैं तो वहीं आंदोलन का हिस्सा बनीं आदिवासी महिलाएं पानी के बीच तैरती लकड़ी के लकड़ियों पर लेटकर अपनी मांगों के लिए न्याय की गुहार लगा रही हैं. प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि सरकार या तो उन्हें सम्मानजनक जीवन दे या फिर इसी जल सत्याग्रह में उनकी जान जाने दे.

प्रशासन पर आरोप
इस महाआंदोलन के बीच प्रशासन पर बेहद अमानवीय और गंभीर आरोप लगे हैं. आंदोलनकारियों का दावा है कि प्रशासन ने आंदोलन स्थल पर पीने के साफ पानी की व्यवस्था जानबूझकर बंद करवा दी है, जिसके चलते बुजुर्ग, महिलाएं और मासूम बच्चे नदी का मटमैला और दूषित पानी पीने को मजबूर हैं और बीमार पड़ रहे हैं. इसके अलावा प्रदर्शनकारियों के मुताबिक बिजावर तहसीलदार अभिनय शर्मा, सटई तहसीलदार इंद्र कुमार गौतम और किशनगढ़ थाना प्रभारी भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे, लेकिन विस्थापितों की समस्याओं का समाधान करने के बजाय, ग्रामीणों पर डराने-धमकाने का दबाव बनाया गया.
हैरानी की बात यह है कि विस्थापितों द्वारा लगाए गए प्रताड़ना के इन गंभीर आरोपों पर प्रशासन की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या सफाई सामने नहीं आई है. देखना होगा कि कब तक प्रशासन इन लोगों की समस्या को अनदेखा करता है.
विकास की बलि चढ़ता अन्नदाता, केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में जलती चिताओं पर लेटे किसान
