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Mamata Banerjee Political Journey: ममता बनर्जी उन नेत्रियों में से एक हैं, जो कभी किसी के आगे नहीं झुकीं और अकेले अपने फैसले लिए और इसलिए पश्चिम बंगाल की दीदी कहलाईं. पढ़ें राजनीति में उनका अब तक का सफर कैसा रहा.
25 मार्च, 2026
सामग्री की तालिका
- दीदी का बचपन
- सफेद साड़ी बनी पहचान
- कांग्रेस से की शुरुआत
- निडर नेता के रूप में उदय
- टीएमसी का गठन
- CPIM की सरकार को उखाड़ फेंका और बनीं मुख्यमंत्री
- 2021 का विधानसभा चुनाव
- 4 मई का इंतजार
भारत की नेत्रियों का सियासी सफर, पुरुषों के मुकाबले सबसे मुश्किल रहा है. परिवार और समाज से बगावत करके कुछ महिलाओं ने सियासत में कदम रखा और लंबे संघर्ष के बाद राजनीतिक तंत्र को अपने काबू में किया है. आज हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की. ममता बनर्जी उन महिलाओं में से एक हैं, जो कभी किसी के आगे नहीं झुकीं और अकेले अपने फैसले लिए और इसलिए पश्चिम बंगाल की दीदी कहलाईं.
ममता बनर्जी ने अपनी राजनीति यात्रा की शुरुआत कांग्रेस पार्टी के साथ की थी. लेकिन बाद में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को जन्म दिया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की कुर्सी काबिज हो गईं. इतना ही नहीं उन्होंने कई उपलब्धियां भी अपने नाम कीं. वे देश की पहली महिला रेल मंत्री बनीं. इसके अलावा उन्होंने राज्य की पहली महिला सीएम बनने का खिताब भी अपने नाम किया. लेकिन आज पश्चिम बंगाल पर राज करने के पीछे उनके दशकों की मेहनत छिपी है. ममता बनर्जी वह नेत्री हैं, जिन्होंने न सिर्फ राजनीति में संघर्ष किया, बल्कि उससे पहले अपने बचपन में बहुत दुख सहे.
दीदी का बचपन
ममता बनर्जी का जन्म पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में 5 जनवरी, 1955 में हुआ था. केवल 9 साल की उम्र में ही उनके सिर से पिता प्रोमिलेश्वर बनर्जी का साया छिन गया था. ममता बनर्जी के कुल 7 भाई बहन हैं और वे सबसे बड़ी बहन हैं, इसलिए पिता के जाने के बाद उनके ऊपर परिवार की जिम्मेदारी आ गई. परिवार की हालत को देखते हुए उन्होंने एक दूध डिपो में काम करना शुरू किया. एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने खुद बताया था कि वह दूध डिपो पर काम करके अपनी मां को लगभग 40-45 रुपये देती थीं, जो उस समय उनके परिवार के लिए बहुत जरूरी था. वह सुबह 3 बजे उठतीं, घर पर खाना बनाती और फिर स्कूल या कॉलेज जाने से पहले काम पर चली जाती थीं.

सफेद साड़ी बनी पहचान
ममता बनर्जी अपनी सादगी के लिए जानी जाती हैं. वह हमेशा सफेद सूती साड़ी और चप्पल पहनती हैं और एक सादे घर में रहती हैं. उन्होंने “सन्यासी” की जीवन जीना चुना ताकि वे पूरी तरह से राजनीति से जुड़ी रहें. उनकी पढाई की बात करें, ममता बनर्जी ने कोलकाता के जोगोमाया दवी कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा किया. इसके बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से इस्लामिक हिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. इसके अलावा भी उन्होंने जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री भी हासिल की.
कांग्रेस से की शुरुआत
ममता बनर्जी ने 15 साल की उम्र में ही राजनीति में कदम रख दिया था. वे कांग्रेस पार्टी से बहुत प्रभावित थी, इसलिए उन्होंने सबसे पहले कांग्रेस की कार्यकर्ता के तौर पर काम करना शुरू किया. पांच सालों के अंदर वे कांग्रेस की जनरल सेक्रेटरी बन गईं. इसके बाद 1978 में ममता बनर्जी को कलकत्ता दक्षिण की जिला कांग्रेस कमेटी की सेक्रेटरी नियुक्त किया गया. 14 साल मेहनत करने के बाद साल 1984 में पार्टी ने उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट दिया. अपने पहले चुनाव में ही उन्होंने जादवपुर सीट पर दिग्गज कम्यूनिस्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर जीत हासिल की और सांसद बन गईं. साल 1991 में ममता बनर्जी दोबारा लोकसभा सांसद चुनी गईं. इस बार उन्हें केंद्र सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया.

निडर नेता के रूप में उदय
साल 1990 में राज्य में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (CPIM) की सरकार थी और ज्योति बसु मुख्यमंत्री थे. इस दौरान ममता बनर्जी इतनी तेजी से उभर रही थीं वे राज्य सरकार के लिए मुश्किलें पैदा करने लगीं थीं . 16 अगस्त, 1990 को ममता बनर्जी पर जानलेवा हमला हुआ. कोलकाता के हाजरा क्रॉसिंग पर ममता बनर्जी रैली को लीड कर रही थीं. अचानक CPI(M) के गुंडों ने लाठी-डंडे और लोहे की रॉड से रैली पर हमला बोल दिया. इस हमले का मुख्य आरोपी लालू आलम था, जो उस समय CPI(M) की यूथ विंग (DYFI) का कार्यकर्ता था. हमले के दौरान, उनके सिर पर डंडे से वार किया गया, जिससे उनके सिर की हड्डी टूट गई. वह गंभीर रूप से घायल हो गईं और लगभग एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रहीं. इस घटना ने उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक “निडर योद्धा” के तौर पर स्थापित किया और उनकी लोकप्रियता और बढ़ा दी.

इसके अलावा जुलाई 1993 में भी ममता बनर्जी के साथ हिंसा हुई थी. ममता फोटो मतदान पहचान पत्र को लेकर कोलकाता में राइटर्स बिल्डिंग की तरफ एक रैली की अगुवाई कर रही थीं. उस समय पुलिस और कार्यकर्ताओं में झड़प हो गई. पुलिस ने कार्यकर्ताओं पर फायरिंग कर दी, जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई, जबकि ममता बनर्जी को भी गंभीर चोटें आई थीं. ममता बनर्जी कई हफ्तों तक अस्पताल में भर्ती रहीं.
टीएमसी का गठन
साल 1996 में फिर से कांग्रेस की टिकट से सांसद बनीं, लेकिन 1998 में ममता बनर्जी और कांग्रेस पार्टी में तकरार हो गईं. उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़कर अपने पार्टी ‘तृणमूल कांग्रेस’ का गठन किया. भले ही आज बंगाल में टीएमसी और बीजेपी एक दूसरे के दुश्मन हैं, लेकिन नई पार्टी बनाने के बाद ममता बनर्जी ने एनडीए का हिस्सा बन गई थीं. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में उन्हें रेल मंत्री बनाया गया. इस तरह 1999 ममता बनर्जी भारत की पहली महिला रेल मंत्री बनीं. उन्होंने इस पद पर रहते हुए कई बड़े फैसले लिए.

CPIM की सरकार को उखाड़ फेंका और बनीं मुख्यमंत्री
2005 के आस-पास, जब बुद्धदेव भट्टाचार्य की नेतृत्व वाली लेफ्ट फ्रंट सरकार ने इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के नाम पर जमीन हड़पना शुरू किया, तो ममता बनर्जी ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया. ममता बनर्जी ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया. उन्होंने किसानों के समर्थन में, खासकर सिंगूर और नंदीग्राम जैसे इलाकों में एक रैलियां शुरू कर दीं. वह खुद सड़कों पर उतरीं और लोगों के बीच जाकर उनके मुद्दे उठाए. लेफ्ट सरकार विरोध करते हुए उन्होंने लोगों को भरोसा जीता और उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगीं. ममता गरीबों और किसानों की आवाज के तौर पर उभरीं.
2021 का विधानसभा चुनाव
मुख्यमंत्री बनने के बाद, ममता बनर्जी ने लगातार अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी. 2016 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और दूसरी बार सत्ता में वापसी की. इस दौरान राज्य में उनका सपोर्ट बेस और मजबूत हुआ. वहीं 2021 के विधानसभा चुनावों में उन्हें हल्का झटका लगा, जब उन्होंने भवानीपुर के अपने किले को छोड़कर नंदीग्राम से चुनाव लड़ा. अपने पुराने साथी और भाजपा नेता सुवेंधु अधिकारी से हार जाने के बाद ममता ने फिर से भवानीपुर से चुनाव लड़ा और वहां से जीत हासिल की. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पूरी ताकत लगाई, लेकिन ममता बनर्जी की लीडरशिप में TMC ने बड़ी जीत हासिल की. पार्टी ने 200 से ज़्यादा सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाई और ममता बनर्जी फिर से मुख्यमंत्री बनीं. इस चुनाव के बाद बीजेपी और टीएमसी की चुनावी दुश्मनी एक स्तर और आगे बढ़ गई, क्योंकि चुनाव के बाद राज्य में भीषण हिंसा हुई, जिसमें बीजेपी ने ममता बनर्जी पर उनके कार्यकर्ताओं को मरवाने के आरोप लगाए. नतीजे आने से पहले ममता ने ‘खेला होबे’ का नारा दिया था, जो पूरे देश में चर्चा में रहा.

लोकसभा चुनाव में भी देती हैं बीजेपी को टक्कर
लोकसभा चुनावों में भी ममता बनर्जी का असर साफ दिखता है. 2014 के आम चुनावों में जब नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में BJP की लहर पूरे देश में थी, तब पश्चिम बंगाल में TMC ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 42 में से 34 सीटें जीती थीं. हालांकि 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन थोड़ा कमजोर हुआ और उसे 22 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा, लेकिन राज्य में उसकी राजनीतिक स्थिति मजबूत बनी रही. कुल मिलाकर, ममता बनर्जी ने अपनी निडरता, संघर्ष और जन आंदोलनों से पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक खास मुकाम हासिल किया है. उन्होंने जनता के भरोसे से न केवल लेफ्ट का शासन खत्म किया, बल्कि लगातार चुनावी जीत से एक देश के दिग्गज नेताओं की लिस्ट में शामिल हुईं.
4 मई का इंतजार
फिलहाल पश्चिम बंगाल में चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ चुनावी बिगुल बज चुका है. सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी कमर कस ली है और हमेशा की तरह आरोप-प्रत्यारोप का खेल भी शुरु हो गया है. पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और 4 मई को विजेता की घोषणा की जाएगी. बता दें, पश्चिम बंगाल में कुल 293 विधानसभा सीटें हैं, जिसमें से टीएमसी ने 291 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. अब देखना दिलचस्प होगा इस चुनाव में ममता दीदी कौन सा नया खेला करती हैं.
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