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एक बार फिर लौट आया 2000 साल पुराना Jamdani Saree का दौर

by Live India
एक बार फिर लौट आया 2000 साल पुराना Jamdani Saree का दौर

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Jamdani Saree Fashion: आज कल हर मॉर्डन लड़की हैंडलूम की दीवानी हो रही है. ऐसे में 2000 साल पुराना जामदानी का फैशन भी एक बार फिर ट्रेंड में लौट आया है.

27 अप्रैल, 2026

अलग-अलग फैशन ट्रेंड्स आने से बहुत पहले, बंगाल के पास ‘जामदानी’ थी. एक ऐसा मलमल, जो इतना बारीक था कि मुगल बादशाह इसे ‘बुनी हुई हवा’ कहते थे. सदियों तक ढाका, शांतिपुर और फुलिया जैसे कस्बों में करघों की गूंज सुनाई देती थी, जहां कपास के धागों पर लकड़ी की शटलें नाचती थीं. इसकी एक-एक और छोटी से छोटी डिटेल हाथ से पिरोई जाती है. आलम ये है कि एक छह गज की साड़ी को तैयार करने में हफ्तों, महीनों और कभी-कभी सालों लग जाते हैं. आज जब फास्ट फैशन और मशीनी कपड़ों का दौर है, तब जामदानी फैशन में शानदार वापसी कर रही है. ग्लोबल समिट से लेकर इंस्टाग्राम फीड तक, भारत एक बार फिर अपनी विरासत के प्यार में पड़ गया है.

नीता अंबानी का जादू

जब नीता अंबानी न्यूयॉर्क में ‘टाइम 100 समिट’ के मंच पर पहुंचीं, तो पूरी दुनिया की नजरें उनके आउटफिट पर टिक गईं. उन्होंने किसी सिल्क या हैवी ड्रेस की बजाय बंगाल की जामदानी साड़ी पहनी. ये कोई मामूली साड़ी नहीं थी, बल्कि पश्चिम बंगाल के फुलिया के पद्मश्री विजेता बीरेन कुमार बसाक ने 2 साल की कड़ी मेहनत के बाद इसे तैयार किया था. क्रीम कलर की इस साड़ी में बारीक मीनाकारी का काम था, जिसमें ट्राइबल मोटिफ्स, लोक कथाएं और गुड लक का प्रतीक मानी जाने वाली मछली का बॉर्डर था. इसका पल्लू किसी पेंटिंग की तरह लग रहा था, जिसमें अलग-अलग डिजाइन को धागों से बनाया गया था.

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सेलेब्रिटीज की फेवरेट

नीता अंबानी अकेली नहीं हैं जो इस आर्ट को बढ़ावा दे रही हैं. देश की कई फीमेल सेलिब्रिटीज अब जामदानी को मॉर्डन लग्जरी की तरह देख रही हैं. कंगना रनौत, प्रियंका चोपड़ा जोनस, रानी मुखर्जी, आलिया भट्ट जैसी हसीनाएं जामदानी की अपना दिल दे चुकी हैं.

इतिहास का साथ

आज के दौर में जामदानी चुनना सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि मशीनी कपड़ों के खिलाफ एक साइलेंस वॉर है. ये इस बात का सबूत है कि हम जानते हैं कि ये कपड़ा कहां से आया है और इसे बनाने वाले हाथ कितने कीमती हैं. जब तक महिलाएं इस विरासत को चुनती रहेंगी, तब तक हमारे कल्चर और अतीत के बीच खूबसूरत बातचीत होती रहेगी.

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