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Jantar Mantar History: दिल्ली की सैर करने जाएं और जंतर मंतर का नाम न सुनें, ऐसा शायद ही कभी हो. लेकिन पिछले कुछ दिनों में ये जगह एक बार फिर सुर्खियों में है. वजह है CJP और देशभर से पहुंचे हजारों छात्र. सरकारी भर्तियों, परीक्षा प्रक्रिया और अपने अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर छात्र जंतर मंतर पर अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं. ऐसे में एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर प्रदर्शन के लिए सबसे पहले जंतर मंतर का नाम ही क्यों सामने आता है? दिल्ली में जब भी किसी आंदोलन, धरने या विरोध प्रदर्शन की बात होती है, तो सबसे पहले जंतर मंतर ही क्यों दिखता है? किसानों से लेकर कर्मचारियों तक, खिलाड़ियों से लेकर छात्रों तक, हर वर्ग ने कभी न कभी यहां अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया है. दिलचस्प बात ये है कि जंतर मंतर की पहचान हमेशा ऐसी नहीं थी. आज यहां छात्र अपने भविष्य और अधिकारों की लड़ाई लड़ते नजर आते हैं. वहीं, करीब 300 साल पहले यही जगह विज्ञान और खगोलशास्त्र का बड़ा केंद्र हुआ करती थी. यहां धरने नहीं, बल्कि सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की चाल का अध्ययन किया जाता था. यहां समय की सटीक गणना होती थी और खगोलीय शोध किए जाते थे. समय बदला, दिल्ली बदली और जंतर मंतर की भूमिका भी बदल गई. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर 18वीं सदी में बनी एक खगोलीय वेधशाला लोकतांत्रिक विरोध की सबसे बड़ी पहचान कैसे बन गई? दरअसल, इसके पीछे का इतिहास उतना ही दिलचस्प है, जितना इस जगह का नाम.
आसमान को पढ़ना
आज समय देखने के लिए घड़ी है, दिशा जानने के लिए GPS है और ग्रह-नक्षत्रों की जानकारी के लिए आधुनिक टेलीस्कोप हैं. लेकिन करीब 300 साल पहले ऐसी कोई आधुनिक तकनीक नहीं थीं. उस दौर में सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की चाल को समझने, सही समय का पता लगाने और पंचांग तैयार करने के लिए बहुत सटीक उपकरणों की जरूरत होती थी. इसी जरूरत को पूरा करने के लिए जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में दिल्ली में जंतर मंतर बनवाया. दिल्ली का जंतर मंतर उनके द्वारा बनवाए गए 5 वेधशालाओं में सबसे पहला था. इसके बाद जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में भी जंतर मंतर बनाए गए. महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय सिर्फ एक राजा ही नहीं, बल्कि गणित, खगोल विज्ञान और वास्तुकला में गहरी रुचि रखने वाले विद्वान भी थे. उन्होंने महसूस किया कि उस समय इस्तेमाल होने वाले छोटे खगोलीय उपकरण पर्याप्त सटीक नहीं थे. इसलिए उन्होंने बड़े आकार के पत्थर और ईंटों से बने ऐसे यंत्र तैयार करवाए, जिनसे ज्यादा सही गणना की जा सके. साल 1724 से 1730 के बीच उन्होंने उत्तर भारत में 5 अलग-अलग जंतर मंतर बनवाए.
जंतर मंतर की खासियत
जंतर मंतर की मदद से, समय की सटीक गणना की जाती थी, सूर्य की ऊंचाई मापी जाती थी, ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति देखी जाती थी, मौसम और ऋतु परिवर्तन का अनुमान लगाया जाता था. इसके अलावा पंचांग और ज्योतिषीय गणनाएं भी तैयार की जाती थीं. वैसे, सम्राट यंत्र जंतर मंतर के सबसे प्रसिद्ध यंत्रों में से एक है. इसे दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर से बनी सूर्य घड़ी माना जाता है. एक टाइम था, जब ये कुछ ही सेकंड की सटीकता से समय बता देता था.
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साइंस का अजूबा
दिल्ली में मौजूद ज्यादातर ऐतिहासिक इमारतें किले, मकबरे या महल हैं. लेकिन जंतर मंतर इन सबसे बिल्कुल अलग है. ये न तो किसी राजा का महल था और न ही कोई धार्मिक स्थल. ये पूरी तरह विज्ञान को समर्पित एक ऐसी वेधशाला थी, जहां बड़े आकार के यंत्र बनाए गए थे. इन यंत्रों का इस्तेमाल सूर्य की दिशा जानने, समय मापने, ग्रहों की स्थिति समझने और खगोलीय गणनाएं करने के लिए किया जाता था. आज भी जब लोग यहां पहुंचते हैं, तो इन विशाल गोलाकार, तिकोने और घुमावदार ढांचों को देखकर हैरान रह जाते हैं. पहली नजर में कई लोगों को ये किसी मॉर्डन आर्ट इंस्टॉलेशन जैसा लगता है. लेकिन वास्तव में हर संरचना का एक वैज्ञानिक उद्देश्य था.
‘जंतर मंतर’ नाम क्यों पड़ा?
‘जंतर मंतर’ नाम संस्कृत भाषा से लिया गया है. इसमें ‘जंतर’ शब्द ‘यंत्र’ से बना है, जिसका मतलब होता है उपकरण या मशीन. वहीं ‘मंतर’ शब्द ‘मंत्रणा’ से निकला है, जिसका मतलब है गणना करना, विचार करना या परामर्श करना. अगर इन दोनों शब्दों को एक साथ जोड़ें, तो जंतर मंतर का मतलब होता है, गणना करने वाला यंत्र या खगोलीय गणनाओं के लिए बनाया गया उपकरण. यही वजह है कि इस जगह का नाम बिल्कुल उसके काम के हिसाब से रखा गया. यहां मौजूद हर संरचना किसी न किसी वैज्ञानिक गणना के लिए बनाई गई थी.
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कहां-कहां हैं जंतर मंतर?
महाराजा जय सिंह ने भारत में 5 जंतर मंतर बनवाए थे. ये पाचों उन्होंने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा जैसे शहरों में बनवाए. हालांकि, मथुरा वाला जंतर मंतर अब मौजूद नहीं है. 1857 से पहले ही इसे उस किले के साथ ध्वस्त कर दिया गया था, जहां ये बनाया गया था. आज दिल्ली, जयपुर, उज्जैन और वाराणसी के जंतर मंतर ही ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मौजूद हैं. वहीं, अगर सबसे बड़े और मशहूर जंतर मंतर की बात करें तो जयपुर का जंतर मंतर सबसे आगे है. यहां सबसे ज्यादा संख्या में खगोलीय यंत्र मौजूद हैं. यही वजह है कि इसे साल 2010 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा भी मिला. यहां देश और विदेश से हर साल लाखों टूरिस्टों के साथ-साथ शोधकर्ता भी पहुंचते हैं. इसके बाद दिल्ली का जंतर मंतर भी काफी लोकप्रिय है. राजधानी के बीचों-बीच बना होने की वजह से यहां बड़ी संख्या में टूरिस्ट आते हैं. अब टूरिस्ट से ज्यादा धरना देने वाले पहुंचते हैं.
हर जंतर मंतर क्यों दिखता है अलग?
दिलचस्प बात ये है कि पांचों जंतर मंतर एक-दूसरे से अलग हैं. हालांकि, इनका उद्देश्य एक ही था. लेकिन हर शहर की भौगोलिक स्थिति, अक्षांश और जरूरत के हिसाब से इनके आकार, डिजाइन और निर्माण में बदलाव किया गया. यही वजह है कि दिल्ली, जयपुर, उज्जैन और वाराणसी के जंतर मंतर देखने में अलग-अलग नजर आते हैं. जयपुर का जंतर मंतर साइज में बड़ा है और वहां ज्यादा यंत्र मौजूद हैं. वहीं, दिल्ली का जंतर मंतर अपनी अलग ऐतिहासिक पहचान रखता है. दिल्ली वाला पहला जंतर मंतर था, जिसने बाद में बनने वाली अन्य वेधशालाओं की नींव रखी.
कैसे बदली पहचान?
करीब 200 साल तक जंतर मंतर मुख्य रूप से एक ऐतिहासिक धरोहर और टूरिस्ट प्लेस के रूप में जाना जाता रहा. लेकिन समय के साथ इसकी पहचान बदलने लगी. बीसवीं सदी के आखिर तक दिल्ली में बड़े प्रदर्शन और धरने इंडिया गेट के पास वाले बोट क्लब लॉन में आयोजित होते थे. हालांकि, 1980 के दशक में बड़े प्रदर्शनों के बाद प्रशासन ने वहां धरनों पर रोक लगा दी. इसके बाद प्रदर्शन के लिए जंतर मंतर रोड को तय किया गया. संसद भवन और कई सरकारी दफ्तरों के पास होने की वजह से ये जगह लोगों की आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए एकदम सही मानी गई. धीरे-धीरे जंतर मंतर देशभर के सामाजिक संगठनों, छात्र समूहों, कर्मचारियों, किसानों और अलग-अलग आंदोलनों का प्रमुख प्रदर्शन स्थल बन गया. खास बात ये है कि जंतर मंतर दिल्ली के बीचो बीच है. ये जगह संसद, सरकारी मंत्रालयों और कई महत्वपूर्ण संस्थानों से ज्यादा दूर नहीं है. ऐसे में यहां प्रदर्शन करने वाले लोगों की बात मीडिया और सरकार दोनों तक आसानी से पहुंच जाती थी. साथ ही ये इलाका ऐसा भी था जहां प्रदर्शन होने के बावजूद पूरी राजधानी की आवाजाही पूरी तरह प्रभावित नहीं होती थी.
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आज भी क्यों खास है जंतर मंतर?
बदलती रही कहानी
आज जंतर मंतर में मौजूद वैज्ञानिक यंत्र पहले जैसी सटीक गणनाएं नहीं कर पाते. इसकी वजह आसपास बनी ऊंची इमारतें हैं, जो सूरज और आकाश की सीधी दिशा को प्रभावित करती हैं. इसके बावजूद इन संरचनाओं की इंजीनियरिंग और डिजाइन आज भी दुनियाभर के वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और वास्तु विशेषज्ञों को आकर्षित करती है.
साइंस और लोकतंत्र का संगम
भारत में शायद ही कोई दूसरा ऐतिहासिक स्थल होगा, जिसने इतने अलग-अलग दौर देखे हों. कभी यहां वैज्ञानिक सूर्य और तारों की चाल समझने आते थे, तो आज ये जगह आम लोगों की आवाज बुलंद करने की पहचान बन चुकी है. जंतर मंतर हमें ये भी सिखाता है कि समय के साथ इमारतों का महत्व बदल सकता है. जो जगह कभी सिर्फ खगोलीय अध्ययन का केंद्र थी, वही आगे चलकर लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का प्रतीक बन गई. ऐसे में अगर अगली बार आप दिल्ली के जंतर मंतर जाएं, तो सिर्फ इसकी अनोखी वास्तुकला को देखकर वापस न लौटें. ये जगह भारत की वैज्ञानिक सोच, ऐतिहासिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों, तीनों की कहानी एक साथ सुनाती है. शायद यही वजह है कि तीन सौ साल बाद भी जंतर मंतर लोगों को अपनी तरफ खींचता है. साथ ही हर पीढ़ी के लिए कुछ नया छोड़ जाता है.
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