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National Smbols of India : राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ?

by Live India
National Smbols of India : राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ?

National Smbols of India : देश 77वां गणतंत्र दिवस बनाने जा रहा है और इसी कड़ी में इतिहास की उन सभी चीजों की पड़ताल की जाएगी जिनको अपनाया गया. इस दौरान हम अशोक स्तंभ के बारे में बता रहे हैं कैसे एकमत होकर राष्ट्रीय प्रतीक को स्वीकार किया गया.

भारत के राष्ट्रीय प्रतीक: 26 जनवरी 1950 की सुबह आम नहीं थी बल्कि वर्षों पुरानी गुलामी के प्रतीकों का अंत थी, जहां पर अंग्रेजी कानून का अंत हो रहा था. भारत के इतिहास में सुनहरा सूर्योदय दर्ज हो रहा था. आजादी के बाद 2 साल 11 महीने और 18 दिन में तैयार हुआ संविधान अब लागू हो गया था. इसके साथ ही देश में नोट, मुहर, ध्वज और प्रतीक सभी बदल गए थे और ये सभी भारत की प्राचीन इतिहास की संस्कृतियों को प्रदर्शित कर रहे थे. इसके अलावा उस दिन सरकारी ऑफिस और अदालतों की मुहरों से ब्रिटिश राज का ठप्पा मिटा दिया गया. सेना के नाम से रॉयल शब्द और वर्दियों से ब्रिटिश क्राउन हटा दिया गया.

अशोक स्तंभ ने सालों पुरानी संस्कृति की याद दिलाई

इसके अलावा नोटों पर छपी महारानी की तस्वीर एक तरह से इतिहास बन गई. ‘By Order of His Majesty the King…’ लेटर हेड अब हटा दिए गए और God Save the queen लोगों की स्मृति से धूमिल होते चले गए. इसी कड़ी में एक प्रतीक को काफी विचार-विमर्श के बाद अपना गया, जिसका नाम था अशोक स्तंभ. ये वह स्तंभ था जिसने सालों पुरानी भारतीय संस्कृति को अपने में समा लिया था और इसको संविधान सभा ने शांति, भाईचारा और समानता प्रतीक माना. इसी कड़ी में धीरे-धीरे सेना की वर्दी, सरकारी दस्तावेजों, मुहरों और नोटों में अशोक स्तंभ चमकने लगा. साथ ही ब्रिटिश झंडा यूनियन जैक को हटाकर देश का राष्ट्रीय झंडा तिरंगा लहराने लगा. लेटरहेड पर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया लिखा गया. दूसरी तरफ राष्ट्रगान के रूप में जन गण मन और राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के रूप में अपनाया गया.

संविधान लागू होने के बाद देश में अशोक स्तंभ, ‘सत्यमेव जयते’ और तिरंगा को अपनाया गया और यह सिर्फ बदलाव नहीं था बल्कि भारत के एक नागरिकों का गणराज्य होना था. अब यहां पर सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं बल्कि संविधान का राज था. यहां पर सभी के लिए समान अवसर और स्वतंत्रता थी, जिसने सदियों बाद देश के नागरिकों को गौरवान्वित किया.

नेहरू ने दिया था सुझाव

भारत को आजादी मिलने वाली थी और उससे पहले 22 जुलाई, 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा के सामने एक प्रस्ताव रखा. इस प्रस्ताव में राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक के लिए डिजाइन तैयार किया गया था. इस दौरान नेहरू ने कहा कि हमारे लिए बेहतर होगा कि हम मौर्य काल के सम्राट अशोक के स्वर्ण दौर के प्रतीक चिह्नों का इस्तेमाल करें. साथ ही आधुनिक भारत को प्राचीन काल के इस इतिहास के मूल्यों और सिद्धांतों के सामने लाना चाहिए, जिससे मानव को एक मानवीय दृष्टि मिले. वहीं, नेहरू ने कहा कि अगर मैंने सम्राट अशोक का जिक्र किया है तो मैं बताना चाहूंगा कि भारतीय इतिहास में ये दौर ऐसा था, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमने एक नई छाप छोड़ी. ये केवल राष्ट्रीय दौर नहीं था बल्कि हमने विदेशों में अपने राजदूतों को स्थापित किया था. साथ ही ये राजदूत सिर्फ साम्राज्य को स्थापित करने के लिए नहीं थे बल्कि शांति, संस्कृति और सद्भाव के प्रतीक के रूप में थे.

कैसे बना राष्ट्रीय प्रतीक

पंडित नेहरू के इस प्रस्ताव सभी नेता एकमत थे और वह भी कहने लगे कि हमारा राष्ट्रीय प्रतीक असरदार होना चाहिए. साथ ही ये भी तय हो गया था कि प्रतीक को अशोक के दौर से ही लिया जाएगा. इसके बाद देश भर के सभी स्कूलों से लोगों को इस संबंध में डिजाइन करने के लिए बुलाया गया. लेकिन उस दौरान कोई भी डिजाइन पूरी तरह से संतुष्ट नहीं कर पाया.

सुरैया तैयब ने किया डिजाइन तैयार

संविधान में जब डिजाइन को लेकर चर्चा चल रही थी उस वक्त ICS अफसर बदरुद्दीन तैयबजी और उनकी पत्नी सुरैया तैयबजी ने एक डिजाइन पेश किया. जिसको संविधान सभा ने स्वीकार कर लिया. इसके कई सालों बाद इनकी बेटी लैला तैयबजी ने कहा था कि मेरी मां ने अशोक स्तंभ का डिजाइन ड्रॉ किया और राष्ट्रपति भवन (उस वक्त वाइसराय लॉज) की प्रेस ने कुछ बदलाव के साथ इसको प्रिंट किया तो इसने हर किसी को प्रभावित किया. लैला ने कहा कि उस वक्त मेरी माता को विश्वास नहीं हुआ कि जिस स्तंभ को डिजाइन कर रही है उसे संविधान सभा सेलेक्ट कर लेगी.

किसने खोजा अशोक स्तंभ

जर्मनी के एक सिविल इंजीनियर फ्रेडरिक आस्कर ओएर्टेल ने सन् 1900 के आसपास सारनाथ में खुदाई करनी शुरू की. ओएर्टेल पेशे एक इंजीनियर तो थे लेकिन उन्हें पुरात्व में भी बहुत रूचि थी. मामला यह है कि उन्होंने यह खुदाई चीनी यात्रियों द्वारा लिखी गई किताबों को पढ़ने के बाद शुरू की थी, जो मध्य काल में सारनाथ के आसपाए थे. इसके बाद इंजीनियर को करीब 7 फीट की खुदाई के बाद 1905 में ये स्तंभ मिला. खास बात यह थी कि खुदाई के बाद सारनाथ में जो शेर मिला था वह पूरी तरह सुरक्षित था और क्लियर नहीं नजर आ रहा था. साथ ही शेर को जिस तरह से उभारा गया था वह कला का नायाब नमूना था.

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