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Strait of Hormuz: स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज एक ऐसा छोटा रास्ता है जिसके बंद होने से पूरी दुनिया परेशान है. सबके मन में बस यही सवाल है कि, क्या हॉर्मुज के बिना पाइपलाइन इस महा संकट की चाबी बनेगी?
02 मई, 2026
ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव को दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन दुनिया की सबसे खास नस ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ अब भी लगभग बंद पड़ी है. वॉर शुरू होने के बाद से समुद्री ट्रांसपोर्टेशन काफी कम हो गया है. हॉर्मुज वो रास्ता है जिससे दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल और भारी मात्रा में लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी LNG गुजरती है. अब जबकि ये रास्ता बंद है, पूरी दुनिया और गल्फ कंट्रीज ‘प्लान बी’ की तलाश में हैं. लेकिन क्या हॉर्मुज का कोई ऑप्शन वाकई मुमकिन है?
हॉर्मुज के बिना दुनिया का हाल?
दशकों से गल्फ कंट्रीज हॉर्मुज पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही थीं. आज ये प्रोजेक्ट्स अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. हालांकि, ये पाइपलाइनें करीब 35 से 55 लाख बैरल तेल रोजाना पहुंचा रही हैं, लेकिन हॉर्मुज से होने वाले 2 करोड़ बैरल के मुकाबले ये ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है.
सबसे बड़ी पाइपलाइन
सऊदी अरब की ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ इस वक्त दुनिया की सबसे इम्पोर्टेन्ट पाइपलाइन सऊदी अरब की ‘पेट्रोलाइन’ है. 1980 के दशक की टैंकर वॉर के दौरान बनी इस पाइपलाइन की क्षमता 2019 में बढ़ाकर 70 लाख बैरल रोजाना कर दी गई थी. लेकिन दिक्कत ये है कि सऊदी अरब के लाल सागर तट पर स्थित ‘यानबू’ टर्मिनल इतना तेल इतनी तेजी से लोड करने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है. ऊपर से, ईरान ने इसे निशाना बनाना भी शुरू कर दिया है. अप्रैल में एक ड्रोन हमले ने इस पाइपलाइन की क्षमता को अस्थायी रूप से कम कर दिया था.
यूएई का एडकोप
यूएई का ‘एडकोप’ प्रोजेक्ट भी काफी खास है. दरअसल, यूएई के पास ‘अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन’ है जो हबशान से फुजैरा तक जाती है. ये सीधे हिंद महासागर में खुलती है, जिससे जहाजों को हॉर्मुज जाने की जरूरत नहीं पड़ती. इसकी क्षमता करीब 20 लाख बैरल रोजाना है. लेकिन यहां भी सिक्योरिटी एक बड़ा चैलेंज है. मार्च में ईरानी ड्रोन हमलों ने फुजैरा के स्टोरेज टैंकों में आग लगा दी थी, जिससे काम ठप हो गया था.
इराक और कुवैत का बुरा हाल
इराक के लिए स्थिति और भी गंभीर है. वॉर से पहले इराक का लगभग पूरा एक्सपोर्ट हॉर्मुज के जरिए बसरा से होता था. नॉर्थ में तुर्की तक जाने वाली एक पाइपलाइन तो है, लेकिन वो इराक के भारी नुकसान की भरपाई करने के लिए बहुत छोटी है. वहीं, कुवैत की हालत सबसे खराब है. कुवैत के पास पाइपलाइन का कोई ऑप्शन ही नहीं है. उसका सारा तेल हॉर्मुज से ही निकलता है. कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन ने ‘फोर्स मैज्योर’ घोषित कर दिया है, जिसका मतलब है कि वो अब अपने तेल सप्लाई के कॉन्ट्रैक्ट्स पूरे करने की सिचुएशन में नहीं हैं.
गैस की प्रोब्लम
कतर के लिए प्रोब्लम तेल नहीं, बल्कि गैस है. दुनिया के टोटल एलएनजी बिजनेस का 19% हिस्सा अकेले कतर से आता है. गैस को पाइपलाइन के जरिए लंबी दूरी तक भेजना मुमकिन नहीं है और इसे जहाजों से भेजने के लिए हॉर्मुज से गुजरना ही पड़ेगा. कतर के पास फिलहाल इसका कोई ऑप्शन नहीं है.
क्या है ऑप्शन?
अब हर किसी के दिमाग में एक ही सवाल है कि, क्या पाइपलाइ नें ही सोल्यूशन हैं? दरअसल, ईरान ने खुद भी हॉर्मुज को दरकिनार करने के लिए 1,000 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बनाई है. हालांकि, बैन और अधूरे इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से वहां भी तेल का फ्लो न के बराबर है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का मुकाबला करने के लिए पाइपलाइन नेटवर्क बनाना कोई आसान काम नहीं है. इसमें अरबों डॉलर का इन्वेस्टमेंट और कम से कम 10 सालोंक का टाइम लगेगा. इसके अलावा सबसे बड़ा चैलेंज सिक्योरिटी का है. पाइपलाइनें और टर्मिनल भी ड्रोन और मिसाइल हमलों से उतने ही अनसेफ हैं जितने कि समुद्री जहाज. यानी साफ है कि हॉर्मुज के बंद होने से पैदा मुश्किल को कोई भी पाइपलाइन पूरी तरह से दूर नहीं कर सकती. जब तक ये समुद्री रास्ता सुरक्षित रूप से नहीं खुलता, दुनिया भर में एनर्जी क्राइसेस और बढ़ती कीमतों का खतरा बना रहेगा.
समाचार स्रोत: पीटीआई
