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कुछ ऐसा था Ajit Pawar का पावरफुल सफर

by Live India
कुछ ऐसा था Ajit Pawar का पावरफुल सफर

Ajit Pawar Story: भारत की सियासत को आज एक बड़ा झटका लगा है. कद्दावर नेता और डिप्टी सीएम अजीत पवार का 66 साल की उम्र में निधन हो गया है. इस मौके पर आज उनकी पावरफुल और रीयल जर्नी के बारे में थोड़ा करीब से जानते हैं.

28 जनवरी, 2026

महाराष्ट्र की सियासत से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. दरअसल, सूबे के कद्दावर नेता और डिप्टी सीएम अजीत पवार अब हमारे बीच नहीं रहे. 28 जनवरी 2026 को बारामती में हुए एक प्लेन क्रेश में उनका निधन हो गया. 66 साल की उम्र में ‘दादा’ का इस तरह जाना राजनीति के एक बड़े चैप्टर का अंत है. ऐसे में बारामती के उस लड़के की कहानी के बारे में जानते हैं, जो अपनी मेहनत और तेवर के दम पर महाराष्ट्र की सत्ता का केंद्र बना.

पावरफुल ‘पवार’ खानदान

अजीत पवार का नाम आते ही सबसे पहले दिमाग में ‘पवार परिवार’ ही आता है. ये कोई नॉर्मल फैमिली नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति और को-ऑपरेटिव आंदोलन की रीढ़ है. इस विरासत की नींव अजीत के दादा-दादी, गोविंदराव और शारदा पवार ने रखी थी. बारामती की सूखी जमीन पर विकास की फसल उगाने का सपना इन्हीं लोगों ने देखा था. अजीत का जन्म 22 जुलाई, 1959 को अहमदनगर में हुआ था. कम ही लोग जानते हैं कि उनके पिता अनंतराव पवार ने उस दौर के दिग्गज फिल्ममेकर वी. शांताराम के साथ राजकमल स्टूडियो में काम किया. यानी अजीत का नाता शुरू से ही ग्लैमर की दुनिया से रहा. हालांकि, उनकी असली यूनिवर्सिटी उनके चाचा और राजनीति के ‘चाणक्य’ शरद पवार ही थे.

सियासत में एंट्री

अजीत पवार ने राजनीति के रास्ते पर चलना अपने चाचा शरद पवार की उंगली पकड़कर ही सीखा. साल 1991 में वो पहली बार बारामती से सांसद चुने गए. लेकिन जब शरद पवार सेंटर में रक्षा मंत्री बने, तो अजीत ने उनके लिए अपनी सीट छोड़ दी. ये उनका अपने परिवार और गुरु के प्रति समर्पण था. इसके बाद वो राज्य की राजनीति में सक्रिय हुए और बारामती विधानसभा सीट को अपना ऐसा किला बनाया जिसे कोई भेद नहीं पाया.

भतीजे ने बनाई अलग पहचान

शरद पवार का अंदाज जहां सबको साथ लेकर चलने का था, वहीं अजीत पवार अपने कड़क स्वभाव और दो-टूक फैसलों के लिए जाने जाते थे. वो काम करने वाले नेता के तौर पर मशहूर हुए. सुबह 6 बजे मंत्रालय पहुंच जाना और अफसरों की क्लास लगाना उनके डेली रूटीन का हिस्सा था. साल 1999 में जब शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई, तो अजीत उनके सबसे बड़े सिपाही बनकर उभरे. सिर्फ 40 साल की उम्र में वो कैबिनेट मंत्री बन गए. उन्होंने सिंचाई मंत्रालय संभाला और वेस्ट महाराष्ट्र में अपना एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया, जिसने उन्हें सिर्फ शरद पवार का भतीजा नहीं, बल्कि अपने आप में एक ‘पावर सेंटर’ बना दिया.

सत्ता और टकराव

कहते हैं कि एक ही म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं. पवार फैमिली में भी कुछ ऐसा ही हुआ. जैसे-जैसे शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले की राजनीति में एंट्री हुई, परिवार के अंदर चीज़ें बदलने लगीं. सुप्रिया का अंदाज सॉफ्ट और नेशनल था, जबकि अजीत जमीन से जुड़े और आक्रामक थे. फिर साल 2023 में महाराष्ट्र ने वो देखा जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी. दरअसल, अजीत पवार ने अपने चाचा से बगावत कर दी और एनसीपी के एक बड़े धड़े के साथ बीजेपी-शिवसेना सरकार में शामिल हो गए. उन्होंने अपना अलग रास्ता चुना और फिर से डिप्टी सीएम बन गए. ये उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा और साहसी फैसला था, जिसने पवार परिवार और पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया.

पर्सनल लाइफ

राजनीति के बाहर अजीत पवार की लाइफ उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार और दो बेटों, पार्थ और जय के इर्द-गिर्द ही घूमता थी. सुनेत्रा न सिर्फ उनकी जीवन साथी थीं, बल्कि उनके निर्वाचन क्षेत्र बारामती में सामाजिक कार्यों की कमान भी संभालती थीं. उनके बड़े बेटे पार्थ ने राजनीति में कदम रखा, जबकि छोटे बेटे जय ने बिजनेस की दुनिया में कदम रखा. ये कहना गलत नहीं है कि अजीत पवार सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि वो महाराष्ट्र के को-ऑपरेटिव बैंकों, चीनी मिलों और एजुकेशन इंस्टीट्यूशन के रक्षक भी थे. बारामती का जो मॉर्डन रूप आज हम देखते हैं, उसके पीछे अजीत दादा की कड़ी मेहनत और विजन है. उनकी मौत के साथ महाराष्ट्र ने एक ऐसा नेता खो दिया है जो विवादों में तो रहा, लेकिन विकास के मामले में जिसका कोई सानी नहीं था.

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