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वंदे मातरम्: संसद ने ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित कर राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को कानूनी सुरक्षा दे दी है. इस नए कानून के तहत अब राष्ट्रीय गीत का अपमान करना एक दंडनीय अपराध माना जाएगा. सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस संशोधन के माध्यम से ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा प्रदान किया गया है. इस ऐतिहासिक कदम ने राष्ट्रीय गीत के इर्द-गिर्द इतिहास और पहचान को लेकर चली आ रही पुरानी बहसों को दोबारा जीवित कर दिया है.
उलेमा-ए-हिंद ने किया था विरोध
‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश में पहले भी कई बड़े राजनीतिक और धार्मिक विवाद हो चुके हैं. साल 2009 में उत्तर प्रदेश के देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने एक फतवा जारी कर देश के मुसलमानों से इस गीत को न गाने की अपील की थी. इसके बाद 2018 में भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया था और कहा था कि कांग्रेस के इसी रुख के कारण देश का विभाजन हुआ. इस नए कानून के लागू होने के बाद राष्ट्र के इस गौरवशाली गीत के सम्मान और इसके वैधानिक महत्व पर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है.
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मिला कानूनी कवच, अनादर पड़ेगा भारी
‘वंदे मातरम्’- वह राष्ट्रीय गीत, जिसने एक सदी से भी ज़्यादा समय से लोगों की भावनाओं को जगाया है, उसे गुरुवार को कानूनी सुरक्षा मिली. संसद ने एक बिल पास किया जिसके तहत इसका अपमान करना अब दंडनीय अपराध होगा. इस कदम ने भारत के इतिहास और पहचान में इसके स्थान को लेकर लंबे समय से चल रही बहस को फिर से हवा दे दी है. सरकार ने कहा कि ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ के तहत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के बराबर का दर्जा दिया गया है. इसके लिए राष्ट्रीय गीत को गाने से जानबूझकर रोकने या इसे गाते समय बाधा डालने के खिलाफ मौजूदा दंडात्मक प्रावधानों को इस गीत पर भी लागू किया गया है. ऐसे अपराधों के लिए तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. दूसरी बार और उसके बाद हर बार दोषी पाए जाने पर कम से कम एक साल की जेल की सज़ा का प्रावधान है.
कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ को नहीं दिया सम्मान
लोकसभा में हंगामे के बीच यह बिल पास हुआ. निचले सदन में हुई संक्षिप्त बहस में केवल दो सदस्यों ने हिस्सा लिया. सदस्यों का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि कांग्रेस को अपने 76 साल के शासनकाल में ‘वंदे मातरम्’ को उचित सम्मान देना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय उसने तुष्टिकरण की राजनीति का सहारा लिया.
राय ने कहा कि “एक भारत, श्रेष्ठ भारत के लिए हमें ‘वंदे मातरम्’ गीत का पूरा रूप (सभी छह पद) चाहिए. उन्होंने बिल पर अपना संक्षिप्त जवाब ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष के साथ समाप्त किया. दो सदस्यों के बोलने के बाद ध्वनि मत से बिल पास हो गया. विपक्ष द्वारा पेश किए गए संशोधनों को सदन ने खारिज कर दिया. बाद में DMK के ए. राजा ने कुछ दस्तावेज़ फाड़े और उन्हें सदन के बीच (वेल) की ओर फेंक दिया. इससे पहले DMK सदस्य के. कनिमोझी ने इस बिल का विरोध करते हुए कहा कि यह राष्ट्रवाद के नाम पर लाया गया ‘हिंदुत्व एजेंडा’है.
कानून लाकर राष्ट्रवाद नहीं थोप सकतेः कनिमोझी
कनिमोझी ने कहा कि यह संघवाद के खिलाफ है. आप कानून लाकर राष्ट्रवाद थोप नहीं सकते. यह गीत देश की धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है. हमारे संविधान निर्माताओं ने समझदारी दिखाते हुए केवल दो पद ही रखे थे, लेकिन आज आप इसे अनिवार्य बनाकर और सभी छह पद न गाने पर इसे अपराध घोषित करके देश को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. BJP के संबित पात्रा ने कहा कि कांग्रेस ने अपने 76 साल के शासनकाल में ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के तौर पर वह सम्मान नहीं दिया, जिसका वह हकदार था.
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यह राष्ट्रीय गीत अपने ‘धर्मनिरपेक्ष’ या ‘इस्लाम-विरोधी’ स्वरूप और भारत की आज़ादी की लड़ाई में अपनी भूमिका को लेकर समय-समय पर तीखी बहस का विषय रहा है. पिछले साल नवंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 1937 में राष्ट्रीय गीत के अहम पदों को हटा दिया गया था, जिससे बंटवारे की नींव पड़ी. उन्होंने कहा कि ऐसी “बांटने वाली सोच” आज भी देश के लिए एक चुनौती है. उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से 1937 में वंदे मातरम् के अहम पदों… यानी इसकी आत्मा को ही हटा दिया गया. वंदे मातरम् के बंटवारे ने ही देश के बंटवारे के बीज भी बोए थे.
बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखी थी कविता
1875 में बंगाली उपन्यासकार-कवि बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा मातृभूमि (देवी काली के रूप में) की स्तुति में रची गई यह कविता कई बार राजनीतिक विवादों के केंद्र में रही है. 1882 में साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ के हिस्से के तौर पर पहली बार प्रकाशित ‘वंदे मातरम्’ सदी के अंत तक अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का नारा बन गया था और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे लोकप्रिय बनाया था. सूचना और प्रसारण मंत्रालय के 1953 के प्रकाशन के अनुसार, इसे पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1896 सत्र में एक राजनीतिक अवसर पर गाया गया था, जिसे रवीन्द्रनाथ टैगोर ने संगीत दिया था. 1900 के दशक की शुरुआत में बंगाल में विभाजन-विरोधी आंदोलन बढ़ने के साथ-साथ इस गीत ने धीरे-धीरे एक गान के सार को अपना लिया. इन्हीं दिनों मुस्लिम नेताओं ने कविता के लोकप्रिय उपयोग पर शुरुआती विरोध जताया.
मुस्लिम लीग के अमृतसर सत्र में ‘वंदे मातरम्’ का विरोध
अमृतसर, 1908: अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के दूसरे सत्र में अध्यक्षीय भाषण देते हुए सैयद अली इमाम ने ‘वंदे मातरम्’ गीत को राष्ट्रीय नारा बनाने पर गहरी निराशा और चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि मूल वंदे मातरम् के छह छंदों में बाद के हिस्से मजबूत धार्मिक गीतों से जुड़े हैं, जो हिंदू देवियों दुर्गा और लक्ष्मी की कल्पना कर उन्हें नमन करते हैं. अली इमाम ने तर्क दिया कि राष्ट्रवाद की आड़ में इस सांप्रदायिक नारे को आगे बढ़ाना भारत में ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ के प्रचार को प्रमाणित करता है, जिससे मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा और संदेह की भावना मजबूत हुई है. कविता, विशेषकर पहले दो शब्द – वंदे मातरम् – धीरे-धीरे राष्ट्रवादी आंदोलन का नारा बन गए.
केवल शुरुआती दो पद ही गाए जाने का प्रस्ताव हुआ था पास
1973 में बॉम्बे के एक नगरपालिका स्कूल में राष्ट्रीय गीत गाने के खिलाफ उठाई गई आपत्तियों के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील ए जी नूरानी के इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में लिखे एक लेख के अनुसार, मुस्लिम लीग ने 1937 में लखनऊ में अपने 25 वें सत्र में अपनाए गए एक प्रस्ताव में वंदे मातरम् को न केवल अपनी प्रेरणा और विचारों में सकारात्मक रूप से इस्लाम विरोधी और मूर्तिपूजक, बल्कि निश्चित रूप से भारत में वास्तविक राष्ट्रवाद के विकास के लिए विध्वंसक करार दिया.
कुछ दिनों बाद 26 अक्टूबर 1937 को कलकत्ता में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में इस विषय पर एक प्रस्ताव पास किया गया. इसमें कहा गया कि जब भी राष्ट्रीय सभाओं में ‘वंदे मातरम्’ गाया जाए, तो केवल शुरुआती दो पद ही गाए जाने चाहिए. साथ ही, आयोजकों को पूरी आज़ादी होगी कि वे ‘वंदे मातरम्’ के अलावा या उसकी जगह कोई दूसरा ऐसा गीत गा सकें जिस पर किसी को कोई आपत्ति न हो.
गांधी ने गीत को राष्ट्रीय भावना से जोड़ा
महात्मा गांधी इसे सबसे शुद्ध राष्ट्रीय भावना से जोड़कर देखते थे. उन्होंने माना कि ‘वंदे मातरम्’ ने उन्हें अपनी ओर खींचा और मंत्रमुग्ध कर दिया, लेकिन उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि यह कोई हिंदू गीत है या सिर्फ़ हिंदुओं के लिए है. आज़ादी के बाद भी गांधी ने ‘वंदे मातरम्’ को जबरन लागू करने के खिलाफ़ सलाह दी. नूरानी के अनुसार, 23 अगस्त 1947 को अलीपुर में उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि हर काम… दोनों में से किसी भी पक्ष की ओर से पूरी तरह से अपनी मर्ज़ी से होना चाहिए. हालांकि, अगले आठ दशकों में राष्ट्रीय गीत गाने का विवादित मुद्दा इसके समर्थन और विरोध, दोनों ही रूपों में सामने आता रहा है.
जमीयत के कदम की हुई थी कड़ी निंदा
सबसे बड़े विवादों में से एक 2009 में हुआ, जब उत्तर प्रदेश के देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने एक फ़तवा जारी कर मुसलमानों से राष्ट्रीय गीत न गाने को कहा. इस्लामिक संगठन का कड़ा विरोध करते हुए 100 से ज़्यादा मुस्लिम विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और लेखकों ने एक बयान जारी कर कहा कि ‘वंदे मातरम्’ पर बहस 1930 के दशक में ही जमीयत के तत्कालीन नेतृत्व की सहमति से सुलझा ली गई थी.
बयान में कहा गया कि हम इस समय ‘वंदे मातरम्’ को लेकर बेवजह विवाद खड़ा करने के जमीयत के कदम की कड़ी निंदा करते हैं. 1973 में BMC स्कूल में राष्ट्रगीत गाने का मुद्दा 2017 में फिर से उठा, जब BJP पार्षद संदीप पटेल ने नगर निकाय द्वारा संचालित स्कूलों में ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा. 2018 में तत्कालीन BJP अध्यक्ष अमित शाह ने देश के बंटवारे के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया और आरोप लगाया कि पार्टी तुष्टीकरण की राजनीति के आगे झुक गई थी.
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