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जब डगमगाया दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य संगठन

by Live India
जब डगमगाया दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य संगठन

नाटो शिखर सम्मेलन: तुर्किए में होने वाले आगामी नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन से ठीक पहले वैश्विक राजनीति में एक ऐसा हाई-वोल्टेज ड्रामा देखा गया, जिसने पूरे यूरोप के सत्ता गलियारों में दहशत फैला दी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सम्मेलन में शामिल होने से साफ इनकार करते हुए एक ऐसा राजनीतिक चक्रव्यूह रच दिया था, जिससे महाशक्तिशाली देशों के पसीने छूट गए. इस नाराजगी की जड़ें ईरान युद्ध के उस दौर से जुड़ी हैं, जब अमेरिका ने अपने सहयोगियों की सुरक्षा के लिए खरबों डॉलर पानी की तरह बहा दिए, लेकिन जब बदले में सैन्य मदद की बारी आई तो नाटो सहयोगियों ने मुंह मोड़ लिया.

अमेरिका पर बढ़ते आर्थिक बोझ से बढ़ा गुस्सा

ट्रंप का यह गुस्सा अमेरिका पर बढ़ते आर्थिक बोझ का वो हिसाब था, जिसने गठबंधन की नींव हिला दी. लेकिन फिर पर्दे के पीछे एक ऐसा ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला गया जिसने पूरी बाजी पलट दी. एक तरफ तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन के साथ ट्रंप की अटूट व्यक्तिगत दोस्ती और दूसरी तरफ नाटो प्रमुख मार्क रुटे का वो ‘ट्रंप ट्रिलियन’ (यूरोपीय रक्षा खर्च बढ़ाने का जादुई दावा) का गुप्त फॉर्मूला. आखिरी वक्त पर ऐसा क्या खेल हुआ कि ट्रंप का गुस्सा शांत हो गया और उन्होंने तुर्किए जाने की हामी भर दी. यह महज एक समझौता है या नाटो को ब्लैकमेल करने की ट्रंप की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत? आइए जानते हैं इस महाविवाद की पूरी स्टोरी.

सम्मेलन कब और कहां होगा?

तुर्किए की मेजबानी में यह ऐतिहासिक 36वां नाटो शिखर सम्मेलन 7-8 जुलाई को तुर्किए की राजधानी अंकारा के बेस्टेपे प्रेसिडेंशियल कॉम्प्लेक्स में आयोजित किया जा रहा है.

सम्मेलन का मुख्य एजेंडा क्या है?

  • रक्षा बजट और आर्थिक जिम्मेदारी: ट्रंप की मांगों के बीच नाटो महासचिव मार्क रुटे यूरोपीय देशों द्वारा सैन्य बजट बढ़ाने पर ज़ोर देंगे ताकि गठबंधन को आर्थिक स्थिरता मिल सके.
  • यूक्रेन को बड़ी सैन्य मदद: इस सम्मेलन में नाटो के यूरोपीय सदस्य और कनाडा मिलकर यूक्रेन को रूस के खिलाफ युद्ध के लिए साल 2027 तक 80 अरब डॉलर (लगभग 70 अरब यूरो) की नई सैन्य सहायता देने का प्रस्ताव पारित करेंगे.
  • रक्षा औद्योगिक क्रांति: हथियारों और सैन्य उपकरणों के उत्पादन को गति देने के लिए अरबों डॉलर के नए खरीद समझौतों (प्रोक्योरमेंट डील्स) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे.
  • सामूहिक सुरक्षा और एकता: मध्य पूर्व (ईरान युद्ध) और रूस के खतरों के बीच नाटो के अनुच्छेद 5 (Article 5) के तहत आपसी रक्षा के संकल्प को और अधिक मजबूत करना.

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मार्क रुटे ने की अमेरिकी राष्ट्रपति की तारीफ

लगभग दो साल पहले NATO के सेक्रेटरी-जनरल के तौर पर काम शुरू करने के बाद से मार्क रुटे ने अपना ज़्यादातर समय अमेरिका को दुनिया के सबसे बड़े मिलिट्री अलायंस से जोड़े रखने की कोशिश में बिताया है. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अलायंस छोड़ने की धमकी पर अमल करने से रोकने के लिए उनकी खूब तारीफ़ भी की है.लेकिन हालात और प्राथमिकताएं बदलती रही हैं, जिससे तुर्की में इस हफ़्ते होने वाली समिट में दांव और ऊंचे हो गए हैं.

बहुत छोटा हिस्सा ही रक्षा पर खर्च करते हैं NATO सहयोगी

शुरुआत में मामला पैसे का था. ट्रंप लंबे समय से NATO सहयोगियों की इस बात के लिए आलोचना करते रहे हैं कि वे अपने राष्ट्रीय बजट का बहुत छोटा हिस्सा ही रक्षा पर खर्च करते हैं. लेकिन पिछले साल हुई समिट में इन समस्याओं का समाधान कर लिया गया था, जब अमेरिकी सहयोगियों ने GDP के हिसाब से अमेरिका जितना ही निवेश करने का वादा किया था.

अब NATO के सामने असली चुनौती उस पैसे को मिलिट्री क्षमता में बदलने की है, खासकर इसलिए क्योंकि यूरोपीय देशों को रूस से संभावित हमले की चिंता सता रही है. फिर भी रुटे ने पिछले महीने व्हाइट हाउस में हुई एक मीटिंग में बची-खुची चिंताओं को दूर करने की कोशिश की. उन्होंने एक नया प्रस्ताव पेश किया जिसमें सुनहरे अक्षरों में ‘द ट्रंप ट्रिलियन’ लिखा एक चार्ट दिखाया गया, जिसमें 2017 से यूरोपीय सहयोगियों और कनाडा द्वारा किए गए 1.2 ट्रिलियन डॉलर के खर्च को दर्शाया गया था.

सहयोगियों से सिर्फ वफादारी चाहते हैं ट्रंप

खर्च को लेकर ट्रंप संतुष्ट नहीं दिखाई दिए. उन्होंने कहा कि वह अभी भी कुछ नाटो सहयोगियों के ईरान युद्ध में शामिल होने से इनकार करने से निराश हैं, जिसे उन्होंने उनसे परामर्श किए बिना इज़राइल के साथ शुरू किया था.ट्रंप ने कहा कि हमें उनके पैसे की ज़रूरत नहीं है. हमें कुछ भी नहीं चाहिए. मैं सिर्फ वफादारी चाहता हूं. ट्रंप ने सुझाव दिया कि यदि तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन इसकी मेजबानी नहीं कर रहे होते तो वह आगामी शिखर सम्मेलन को पूरी तरह से छोड़ देते. यह एक संकेत है कि एर्दोगन और रुटे भी शिखर सम्मेलन को ट्रैक पर रखने के लिए ट्रंप के साथ रहेंगे.

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रुटे ने व्हाइट हाउस में एक नया मार्कर किया स्थापित

ऐतिहासिक रूप से NATO के सबसे बड़े सिविलियन अधिकारी, जो हमेशा एक यूरोपीय होते हैं, कभी अमेरिकी नहीं, का मुख्य काम एक ऐसे संगठन में आम सहमति बनाना रहा है जो सर्वसम्मति से फ़ैसले लेता है और सभी 32 सदस्य देशों की ओर से बात करना रहा है. लेकिन ट्रंप के दोनों कार्यकाल के दौरान, रुटे और NATO प्रमुख के तौर पर उनसे पहले के अधिकारी जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने अमेरिका को अपने गठबंधन में बनाए रखने में ही अपनी बहुत ज़्यादा ऊर्जा लगाई है.

ट्रंप ने NATO छोड़ने की दी थी धमकी

ट्रंप ने NATO छोड़ने की धमकी दी है. यूरोप से अमेरिकी सैनिकों को हटाने पर विचार किया है और सहयोगी देश डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्त हिस्से, ग्रीनलैंड द्वीप पर कब्ज़ा करने का वादा किया है. उन्होंने इस बात पर संदेह जताया है कि क्या वह किसी ऐसे सदस्य देश की रक्षा करेंगे जो अपनी सेना पर पर्याप्त खर्च नहीं करता, जिससे भरोसा कम हुआ है. रुटे का तरीका चापलूसी भरा रहा है. पिछले महीने ओवल ऑफिस में बहुत सोच-समझकर की गई उनकी बातचीत, जिसमें अमेरिकी झंडे जैसी चीज़ें शामिल थीं, ने एक नया उदाहरण पेश किया, जबकि इससे पहले ट्रंप की तुलना ‘डैडी’ से करने के लिए उनकी काफ़ी आलोचना हुई थी.

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मुश्किल समय में यूरोप से सेना हटाने की दी है धमकी

NATO अपने सबसे बड़े और सबसे ताकतवर सहयोगी के बिना काम नहीं कर सकता. यूरोप को खुद अपनी सुरक्षा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जबकि रूस, जो इस गठबंधन के बनने की मुख्य वजह था, अब और बड़ा खतरा बन गया है. पिछले महीने, पेंटागन ने अपने NATO सहयोगियों को चौंकाते हुए घोषणा की कि अगर उनमें से किसी पर हमला होता है, तो वह मदद के लिए भेजे जाने वाले सैनिकों, युद्धपोतों, विमानों और ड्रोन की संख्या कम कर देगा. ट्रंप ने भी अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम करने या बढ़ाने को लेकर अलग-अलग तरह के संकेत दिए हैं. एक स्टडी के मुताबिक, इन कटौतियों और अलग-अलग तरह के संदेशों ने गठबंधन की एकता को कमजोर किया है. यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब रूस कई देशों में मौजूद मिलिट्री बेस के पास ड्रोन उड़ाकर यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को परख रहा है.

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अब नई चुनौतियां हैं

हर समिट का मकसद सामूहिक सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाना होता है यानी NATO की संधि के आर्टिकल 5 में शामिल ‘सब एक के लिए और एक सबके लिए’ वाला वादा. इसे सिर्फ़ एक बार लागू किया गया था, जब 11 सितंबर के हमलों के बाद सहयोगी देश अमेरिका की मदद के लिए आगे आए थे. पिछली NATO समिट हेग में हुई थी, जो डच प्रधानमंत्री रह चुके रुटे का गृहनगर है.

डच शाही परिवार ने डिनर का आयोजन किया था और ट्रंप राजा के महल में रुके थे. रुटे ने सहयोगी देशों को रक्षा पर ज़्यादा खर्च करने के वादे के लिए राज़ी कर लिया और ट्रंप खुश होकर लौटे. उन्होंने अपने NATO सहयोगियों को अच्छे लोगों का समूह कहा. इस साल, समिट की मेज़बानी एर्दोगन करेंगे, जो NATO के एक और अहम सदस्य हैं और अपनी आज़ाद सोच के लिए जाने जाते हैं. ट्रंप के साथ उनके करीबी रिश्ते अमेरिकी राष्ट्रपति को बातचीत की मेज़ पर बनाए रख सकते हैं, लेकिन इससे मतभेद दूर होने की संभावना कम ही है.

सहयोगियों से और रक्षा बजट चाहते हैं ट्रंप

रुटे ने ट्रंप को यह समझाने की कोशिश की है कि उनके यूरोपीय सहयोगी इतना ज़्यादा खर्च कर रहे हैं कि अमेरिका बेझिझक चीन से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों पर ध्यान दे सकता है, जबकि वे यूक्रेन में चल रहे युद्ध को संभाल लेंगे. लेकिन ट्रंप अब और ज़्यादा चाहते हैं, और उनकी वफ़ादारी की मांग को किसी चार्ट पर नहीं दिखाया जा सकता. रुटे से पहले के प्रमुख स्टोल्टेनबर्ग ने अपनी यादों में 2018 के उस समिट की अध्यक्षता के बारे में लिखा है जिसे ट्रंप ने लगभग बिगाड़ ही दिया था. स्टोल्टेनबर्ग ने लिखा कि अगर कोई अमेरिकी राष्ट्रपति यह कहे कि वह अब दूसरे सहयोगियों की रक्षा नहीं करना चाहता और विरोध में NATO समिट से चला जाए, तो NATO संधि और उसकी सुरक्षा गारंटी का कोई खास मतलब नहीं रह जाता.

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