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बंटवारे के जख्मों पर मरहम है इम्तियाज की Main Vaapas Aaunga

by Live India
बंटवारे के जख्मों पर मरहम है इम्तियाज की Main Vaapas Aaunga

Main Vaapas Aaunga Review: कुछ फिल्में आपको हंसाती हैं, कुछ रुलाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो धीरे-धीरे आपके दिल में घर बना लेती हैं. इम्तियाज अली की नई फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ इसी तीसरी कैटेगरी में आती है. ये कोई हाई स्पीड थ्रिलर मूवी नहीं है, न ही ये सिर्फ रोमांस बेचने वाली एक और लव स्टोरी है. ये फिल्म प्यार, प्यार में बिछड़ने, खूबसूरत यादों, बंटवारे के दर्द और इंसानी रिश्तों की उस गर्माहट की कहानी है जो वक्त और सीमाओं से भी बड़ी बन जाती है. सिनेमा के इस दौर में जहां ज्यादातर फिल्में बॉक्स ऑफिस फॉर्मूले, एक्शन और क्ंट्रोवर्सी के सहारे ऑडियन्स को अपनी तरफ अट्रैक्ट करने की कोशिश करती हैं, वहीं इम्तियाज अली ने एक ऐसी कहानी सुनाने का रिस्क उठाया है जो शोर नहीं करती, बल्कि सीधे दिल से बात करती है. यही वजह है कि ‘मैं वापस आऊंगा’ सिर्फ एक फिल्म नहीं लगती, बल्कि एक फीलिंग की तरह आपके दिल पर कब्ज़ा करने की कोशिश करती है.

कहानी की शुरुआत

फिल्म का सबसे खास कैरेक्टर है ईश्वर उर्फ कीनू, जिसका रोल नसीरुद्दीन शाह ने निभाया है. उम्र के आखिरी पड़ाव पर खड़े कीनू को स्ट्रोक आया है. बॉडी उनका साथ छोड़ चुकी है, लेकिन दिल अब भी एक अधूरे वादे, अधूरे रिश्ते और अधूरी ख्वाहिश से बंधा हुआ है. वो बार-बार सिर्फ एक बात कहते हैं कि, मुझे वापस जाना है. शुरू शुरू में ये बातें बस एक बूढ़े आदमी की जिद लगती है. लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, पता चलता है कि ये सिर्फ एक जिद नहीं है, ना ही अपने पुराने घर वापस लौटने की इच्छा है. ये उस सच्चे प्यार तक पहुंचने की तड़प है जो 1947 के बंटवारे में उनसे छिन गई थी. दूसरी तरफ है निर्वैर, जिसका कैरेक्टर सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ ने निभाया है. लंदन में रहने वाला ये लड़का मॉर्डन सोच वाला, करियर पर फोकस करने वाला और रिश्तों से थोड़ा डर कर रहने वाला है. मगर वो अपने दादा की आखिरी और अधूरी इच्छा पूरी करने के लिए एक ऐसे सफर पर निकलता है जो सिर्फ पाकिस्तान तक नहीं, बल्कि उसके अपने अतीत और पहचान तक भी जाता है.

अलग अंदाज़ में बंटवारे की कहानी

हिंदी सिनेमा में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे पर अब तक बहुत सी फिल्में बन चुके हैं. सनी देओल की गदर को छोड़ दिया जाए तो, ज्यादातर फिल्मों में पॉलिटिकल इंसिडेंट, वायलेंस और हिंदू-मुस्लिम टेंशन पर फोकस किया गया है. हालांकि, गदर की शुरुआत भी कुछ ऐसी ही होती है. लेकिन इम्तियाज अली का नजरिया बिल्कुल अलग है. वो बंटवारे को इतिहास की किताबों वाली घटना नहीं बनाते. उनके लिए ये दो प्रेमियों के बीच अचानक खिंच गई एक लाइन है, जिसके बाद दोनों हमेशा के लिए अलग हो जाते हैं. ये बंटवारा दोनों को एक ऐसा जख्म देता है, जो दशकों बाद भी भर नहीं पाता. यही वजह है कि इम्तियाज अली की ‘मैं वापस आऊंगा’ कहीं भी किसी धर्म या समुदाय को दोषी ठहराने की कोशिश नहीं करती. यहां असली विलेन नफरत, पॉलिटिक्स और हिस्ट्री की वो बेरहम मशीनरी है जिसने लाखों लोगों की जिंदगी बदलकर रख दी. यही बात फिल्म को खास और रियलिस्टिक बनाती है.

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जान है लव स्टोरी

यंग कीनू और जिया की लव स्टोरी इस फिल्म की जान है. वेदांग रैना और शरवरी वाघ ने इन कैरेक्टर्स को बहुत खूबसूरती से जिया है. दोनों के बीच मासूमियत है, दोस्ती है, शरारत है और वो सच्चाई है जो आज के टाइम की लव स्टोरीज में शायद ही देखने को मिलती है. दोनों के बीच के सीन्स आपको पुराने बॉलीवुड रोमांस की याद दिलाएंगे. ऐसे रोमांटिक सीन्स, जिनमें प्यार को दिखाने के लिए बड़े-बड़े डायलॉग नहीं, बल्कि छोटी-छोटी हरकतें, नजरें और इमोशन्स होते थे. जिया का कैरेक्टर और ज्यादा इम्प्रेसिव लगता है, क्योंकि वो लड़की स्ट्रॉन्ग भी है, शरारती भी और बहुत ज्यादा इमोशनल भी. जब दोनों अलग होते हैं तो ऑडियन्स सिर्फ उन्हें नहीं, बल्कि उस पूरे दौर को महसूस करने लगते हैं जिसने हजारों लव स्टोरीज को अधूरा छोड़ दिया.

सबसे बड़ी ताकत

अगर कोई पूछे कि ‘मैं वापस आऊंगा’ की वो सबसे बड़ी वजह क्या है जिसे देखने के लिए थिएटर जाना चाहिए, तो जवाब होगा नसीरुद्दीन शाह. उन्होंने कीनू के कैरेक्टर को सिर्फ निभाया नहीं है, बल्कि जी लिया है. बिस्तर पर पड़े एक बूढ़े आदमी की आंखों में उम्मीद, दर्द, प्यार और इंतजार को दिखाना आसान काम नहीं होता. लेकिन नसीरुद्दीन शाह हर सीन में वाकई में कमाल कर जाते हैं. कई बार तो वो बिना एक शब्द बोले सिर्फ अपनी आंखों से इतना कुछ कह देते हैं कि ऑडियन्स इमोशनल हो जाती है. ऐसे में ये कहना गलत नहीं है कि नसीर की एक्टिंग फिल्म को एक अलग लेवल पर ले जाती है.

दिलजीत का बैलेंस

सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ पिछले कुछ सालों से खुद को लगातार बढ़िया एक्टर साबित करने में लगे हुए हैं. काफी हद तक वो कामयाब भी रहे हैं. ‘मैं वापस आऊंगा’ में भी उन्होंने शानदार काम किया है. निर्वैर के कैरेक्टर में वो आज की नई जेनेरेशन को रिप्रेजेंट करते हैं. एक ऐसी जेनेरेशन जो अपनी लाइफ में प्यार तो चाहती है, लेकिन कमिटमेंट से दूर भागती है. वो रिलेशनशिप चाहती है लेकिन इमोशनली किसी के सामने खुलने से हिचकती है. अब निर्वैर जैसे-जैसे अपनी फैमिली की हिस्ट्री को जानने लगता है, वैसे-वैसे उसका रिश्तों को लेकर नजरिया भी बदलता जाता है.दिलजीत ने इस इमोशनल बदलाव को बहुत ही खूबसूरती से इम्तियाज की फिल्म उतारा है.

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सबसे स्ट्रॉन्ग पहलू

‘मैं वापस आऊंगा’ सिर्फ एक लव स्टोरी नहीं है. ये पीढ़ियों तक चले आने वाले ट्रॉमा की कहानी भी है. फिल्म दिखाती है कि हमारे दादा-दादी और नाना-नानी की पीढ़ी ने अपने अंदर कितने दर्द दबाकर रखे थे. उन्होंने कभी अपने जख्मों के बारे में खुलकर बात ही नहीं की, क्योंकि वो अपने बच्चों को उस दर्द से बचाना चाहते थे. लेकिन इम्तियाज अली की फिल्म ये भी बताती है कि सालों से दिल में दबाया हुआ दर्द कभी खत्म नहीं होता. वो किसी न किसी तरह से अगली पीढ़ियों को ट्रांसफर हो जाता है. यही वजह है कि निर्वैर अपने अंदर मौजूद, अकेलेपन, खालीपन और रिश्तों के डर को समझने लगता है.

बेहतरीन क्लाइमैक्स

‘मैं वापस आऊंगा’ का आखिरी आधा घंटा इमोशन्स का तूफान है. निर्वैर पाकिस्तान पहुंचता है और जिया को ढूंढ़ने के लिए पूरी जान लगा देता है. हर कदम पर उम्मीद बनी रहती है कि शायद अब दोनों मिल जाएंगे. लेकिन यही पर कहानी एक बड़ा और दर्दनाक मोड़ लेती है. निर्वैर को पता चलता है कि जिया, जो अफसाना के नाम से जानी जाती थी, एक साल पहले ही इस दुनिया को छोड़कर जा चुकी है. सबसे इमोशन बात ये है कि उसने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ और सिर्फ कीनू के इंतजार में बिता दी. जब कीनू वीडियो कॉल पर उसकी तस्वीर देखता है, तो वो अपनी यादों में फिर से यंग जिया को देखने लगता है. वो उससे पूछता है, क्या अब मैं जा सकता हूं? जैसे जिंदगी से आज़ाद होने के लिए परमिशन मांग रहा हो. तब जिया की याद जैसे उसे इजाजत दे देती है. ये सीन इतना इमोशनल है कि थिएटर में कई लोगों की आंखें भीग भी सकती हैं.

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रहमान का म्यूज़िक

कुछ कमजोरियां भी हैं

इम्तियाज अली की ‘मैं वापस आऊंगा’ पूरी तरह परफेक्ट भी नहीं है. 166 मिनट की लंबाई कुछ ऑडियन्स को ज्यादा लग सकती है. इसके अलावा कुछ जगहों पर कहानी जरूरत से ज्यादा इमोशनल हो जाती है. कभी-कभी लगता है कि इम्तियाज ने ये कहानी लोगों को एंटरटेन करने के लिए कम और मैसेज देने के लिए ज्यादा बनाई है. वेदांग रैना की एक्टिंग अच्छी है, लेकिन कई बार वो यंग नसीरुद्दीन शाह बनने के चैलेंजेस को पूरी तरह पार नहीं कर पाते. वहीं, शरवरी वाघ के कैरेक्टर को भी और जगह दी जा सकती थी. साथ ही फिल्म का संगीत खूबसूरत होने के बावजूद उतना यादगार नहीं बन पाता. वैसे भी इम्तियाज अली और ए आर रहमान की जोड़ी से लोगों को काफी उम्मीदें रहती है. लेकिन इस बार वो उम्मीदें पूरी नहीं हो रही हैं.

क्या फिल्म देखनी चाहिए?

हालांकि, अगर आप ये पूछेंगे कि क्या ये फिल्म देखनी चाहिए? तो इसका जवाब है बिल्कुल. अगर आप सिर्फ एक्शन, कॉमेडी और मसाला फिल्मों के शौकीन हैं तो हो सकता है कि ‘मैं वापस आऊंगा’ आपके लिए न हो. लेकिन अगर आपको ऐसी कहानियां पसंद हैं जो दिल में उतर जाएं, जो रिश्तों की खूबसूरती और दर्द को महसूस कराएं, तो ‘मैं वापस आऊंगा’ आपके लिए बनी है. ये फिल्म हमें याद दिलाती है कि प्यार सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है. कभी-कभी प्यार लंबा और कभी ना खत्म होने वाला इंतजार भी बन जाता है. ये फिल्म बताती है कि घर सिर्फ एक जगह नहीं होता, बल्कि एक फीलिंग होता है. सबसे बड़ी बात, ये फिल्म हमें याद दिलाती है कि नफरत हमेशा लोगों को बांटती है, लेकिन प्यार पीढ़ियों तक लोगों को जोड़कर रखता है. इम्तियाज अली ने एक बार फिर साबित किया है कि जब बात लव स्टोरीज सुनाने की हो, तो वो हिंदी सिनेमा के सबसे सेंसिटिव और भरोसेमंद स्टोरी टेलर्स में से एक हैं. यही वजह है कि उनकी ‘मैं वापस आऊंगा’ ऐसी फिल्म है जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद खत्म नहीं होती. ये आपके साथ घर तक आती है, आपकी बातों में बस जाती है और शायद कई दिनों तक आपके दिल में भी बनी रह सकती है.

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