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2026 Election Results Impact: हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों ने न केवल नई सरकारें चुनी हैं, बल्कि ये नतीजे 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए भी कई मायनों में अहम हैं. यहां जानिए कैसे.
8 मई, 2026
परिचय
- बंगाल की बयार का कितना पड़ेगा असर
- क्या DMK- कांग्रेस की दरार 2029 तक भर पाएगी?
- असम में कौन होगा विपक्षी नेतृत्व का चेहरा
- असम में कौन होगा विपक्षी नेतृत्व का चेहरा
- पुडुचेरी में छिन सकती है एक सीट
2026 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों ने भारत का राजनीतिक नक्शा बदल दिया है और जब भी नक्शा बदलता है तो उसका प्रभाव भविष्य में लिए जाने वाले हर फैसले पर पड़ता है. पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी के नतीजों से यह बात पूरी तरह साफ हो गई है कि भारतीय लोकतंत्र अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है, एक ऐसा दौर जो केवल राष्ट्रीय मुद्दों से नहीं, स्थानीय नेतृत्व, विकास और स्थानीय पहचान से चलता है. बीजेपी के लिए यह चुनाव बेहद खास थे. बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में दीदी और मोदी की लड़ाई में प्रचंड जीत हासिल की और असम में एनडीए ने हैट्रिक लगाकर सरकार बनाई.
वहीं तमिलनाडु में नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया, जब मात्र दो साल पहले बनी एक्टर विजय की पार्टी (TVK) सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनकर उभरी. एक ऐसे समय में जब देश की राजनीति बड़े राष्ट्रीय चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही थी, विजय ने यह साबित किया कि दक्षिण भारत में क्षेत्रीय नेतृत्व आज भी चुनावी समीकरण बदलने की शक्ति रखता है. केरल में सत्ता परिवर्तन ने कांग्रेस के लिए नई उम्मीद पैदा की, जबकि पुडुचेरी में एनडीए की दोबारा वापसी हुई. इन चुनावों ने राजनीति को न केवल नए मुख्यमंत्री या नई सरकारें दीं, बल्कि ये 2029 के लोकसभा चुनाव की दिशा, विपक्षी गठबंधन की रणनीति, भाजपा का लक्ष्य और क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाओं पर भी गहरा असर डालेंगे.
बंगाल की बयार का कितना पड़ेगा असर
पश्चिम बंगाल भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक है, जहां 7 करोड़ वोटर्स केंद्र की सत्ता तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. इस चुनाव में बीजेपी ने ममता बनर्जी की 15 साल की सत्ता को जड़ से उखाड़ फेंका है, क्योंकि उसने न सिर्फ 207 का जादुई आंकड़ा पार किया, बल्कि खुद ममता बनर्जी को उनके गढ़ भवानीपुर में हरा दिया. ममता बनर्जी के 22 मंत्री भी हार गए. बीजेपी ने इस चुनाव में सीमा घुसपैठ, तुष्टीकरण और महिला सुरक्षा को टीएमसी के खिलाफ अपना हथियार बनाया. बीजेपी ने ममता बनर्जी पर बांग्लादेशी घुसपैठ को बढ़ावा देने, मुस्लिम तुष्टीकरण करने और आरजीकर रेप हत्या मामले के दोषियों को बचाने का गंभीर आरोप लगाया और पूरे चुनाव में इसे रटती रही.

बीजेपी ने आरजी कर केस की पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ और संदेशखाली की पीड़िता रेखा पात्रा को टिकट देकर राज्य में महिलाओं का भरोसा जीता और ममता बनर्जी की दीदी छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया. 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी टीएमसी का सबसे बड़ा हथियार था. लेकिन इस बार मुस्लिम बहुल सीटों पर भी बीजेपी जीत गई, जो दिखाता है कि मुस्लिम आबादी का अब टीएमसी से मोह भंग हो गया है. घुसपैठ के मुद्दे को भी जमकर भुनाया गया, जिसने बंगाली जनता के मन में राष्ट्रवाद को और उभारा. इन सभी मुद्दों ने टीएमसी को 80 सीटों पर सिमटा दिया. अगले तीन साल में बीजेपी अगर इनसे जुड़े कुछ बड़े फैसले लेती है, तो जनता का भरोसा और बढ़ सकता है. पिछले लोकसभा चुनाव की बात करें, बंगाल की 42 सीटों में टीएमसी ने 29 सीटें जीती थीं और बीजेपी ने 12 सीटें हासिल की थीं. वहीं कांग्रेस ने 1 सीट जीती थी.
गौरतलब हो कि पिछले लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी इंडिया ब्लॉक में आंतरिक कलह का मुख्य कारण थीं. वे गठबंधन की प्रमुख बनने की जिद पर अड़ी थीं. लेकिन इस चुनाव में हार के कारण राष्ट्रीय स्तर पर उनकी भूमिका और कमजोर हो गई है. यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्षी गठबंधन का मजबूत सिपाही, जो बीजेपी को टक्कर देता था, अब खुद अपनी साख बचाने में लगा है. बड़े पैमाने पर इंडिया ब्लॉक भी ममता बनर्जी की हार के साथ कमजोर हो गया है. बंगाल विधानसभा चुनाव को 2029 का ट्रेलर माना जा रहा है, यानी लोकसभा में बीजेपी को बंगाल में बढ़त मिलने की संभावना बहुत ज्यादा है, जिससे वह 400 पार के लक्ष्य को आसानी से हासिल कर सकेगी.
क्या DMK- कांग्रेस की दरार 2029 तक भर पाएगी?
भाषाई पहचान और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति करने वाली DMK को तमिलनाडु में बड़ा झटका लगा है. एमके स्टालिन की 10 साल पुरानी सरकार खत्म हो गई है. तमिलनाडु की राजनीति में एक्टरों के नेता बनने का लंबा इतिहास रहा है. हालांकि, स्टालिन खुद को काफी मजबूत मानते थे. ऐसे में, नौसिखिया माने जाने वाले विजय की भारी जीत ने सारे समीकरण उलट-पुलट कर दिए हैं. एक्टर विजय थलपति की पार्टी TVK ने 108 सीटों पर जीत हासिल की. तमिलनाडु में बहुमत का नंबर 118 है. इस तरह विजय सरकार बनाने के करीब हैं. फिलहाल विजय को 10 सीटों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. विजय ने चुनाव में जनता से कई बड़े वादे किए , जो उनकी जीत का सबसे बड़ा फैक्टर हैं. टीवीके ने परिवार की महिलाओं को आर्थिक सहायता, सालाना 6 मुफ्त सिलेंडर, गरीब परिवार की बेटियों की शादी में 8 ग्राम सोने देने का भी ऐलान किया और सबसे बड़ा वादा था बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा, जिससे टीवीके ने राज्य की महिलाओं को साधा. जनता ने इन वादों पर भरोसा कर टीवीके को प्रचंड जीत दिलाई.

डीएमके ने सत्ता तो खोई ही, यहां तक की स्टालिन खुद अपनी सीट कोलाथुर भी नहीं बचा पाए. 2021 विधानसभा चुनाव की तुलना में डीएमके का रिजल्ट 55 प्रतिशत तक गिर गया है. DMK की हार के तुरंत बाद इंडिया ब्लॉक में दरारें दिखने लगी हैं. तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस ने TVK को समर्थन दे दिया है और डीएमके ने कांग्रेस को धोखेबाज का ठप्पा. डीएमके-कांग्रेस के रिश्ते फिलहाल पूरी तरह से टूट गए हैं, जिस कारण 2029 में एंटी-BJP वोटों का बिखरना भी तय है. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो, 2024 में तमिलनाडु की सभी 39 सीटें जीतने वाली डीएमके का प्रदर्शन 2029 में गिर सकता है. डीएमके के वोटर्स टीवीके का हाथ थाम सकते हैं, क्योंकि BJP फिलहाल सिर्फ हिंदुत्व या नेशनल लीडरशिप के दम पर सफलता पाने से बहुत दूर दिखाई देती है.
असम में कौन होगा विपक्षी नेतृत्व का चेहरा
असम में बीजेपी ने तीसरी बार वापसी की है. हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी ने असम में मजबूत शासन और वैचारिक स्पष्टता के साथ सरकार बनाई है. बीजेपी ने 82 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस 126 सीटों वाली विधानसभा में केवल 19 सीटों पर सिमट कर रह गई. असम में हिमंता बिस्वा सरमा का नेतृत्व, परिसीमन, घुसपैठ पर प्रहार, लोक कल्याणकारी योजनाएं और विपक्ष की कमजोरी ने बीजेपी को जीत दिलाई. वहीं कांग्रेस को परिसीमन, नेतृत्व की कमी और जनता को बेहतर योजनाएं न दे पाना उनकी हार का कारण बना. असम की जनता ने बदलाव की जगह स्थिरता को चुना.

कांग्रेस पार्टी के लिए इस हार को झेलना काफी मुश्किल है. कांग्रेस ने लोकसभा सांसद गौरव गोगोई को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था, लेकिन वे अपने ही सीट से हार गए. यह उनके लिए करारी हार साबित हुई, क्योंकि गोगोई जोरहाट से ही लोकसभा सांसद भी हैं, इसके बावजूद वे वहां विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाए. इससे पता चलता है कि असम में कांग्रेस की पकड़ कितनी कमजोर पड़ती जा रही है.
केरल में कांग्रेस को मिला कॉन्फिडेंस
केरल में भी इस साल सत्ता परिवर्तन हुआ है. कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) ने CPIM के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा(LDF) को हरा कर जीत हासिल की है. UDF ने 140 विधानसभा सीटों में से 102 सीटें हासिल की हैं. वहीं LDF केवल 35 सीटों पर सिमट कर रह गई है. इसी के साथ केरल में लेफ्ट के 10 साल की सत्ता का अंत हो गया है. एंटी-इंकम्बेंसी, भ्रष्टाचार के आरोप और बढ़ता हुआ कर्ज LDF की हार का कारण बने.

जहां एक तरफ बंगाल, असम और तमिलनाडु में कांग्रेस को निराशा हाथ लगी. वहीं दूसरी तरफ केरल में जीत ने कांग्रेस का कॉन्फिडेंस बढ़ाया है. वायनाड से राहुल गांधी के कनेक्शन और उनके कैंपेन ने UDF की मदद की है, जिससे कांग्रेस के 2029 में 20 लोकसभा सीटों में से ज्यादातर पर कब्जा करने की उम्मीद है. हालांकि INDIA ब्लॉक के अंदर 2026 के नतीजे 2029 के लिए सीट-शेयरिंग की बातचीत को मुश्किल बना सकते हैं, क्योंकि कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर सहयोगी हैं, लेकिन केरल में एक-दूसरे के विरोधी हैं.
पुडुचेरी में छिन सकती है एक सीट
पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों में मुख्यमंत्री एन. रंगासामी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने शानदार जीत हासिल की है. इस गठबंधन ने 30 सदस्यीय विधानसभा में कुल 18 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है. पुडुचेरी के इतिहास में 2006 के बाद यह पहली बार है जब किसी मौजूदा सरकार को जनता ने दोबारा चुना है. पुडुचेरी में केवल एक लोकसभा सीट है. पिछले लोकसभा चुनाव में यह सीट कांग्रेस के वी. वैथिलिंगम ने जीती थी. लेकिन इस बार एनडीए की 18 सीटें कांग्रेस से यह सीट छीनने का संकेत देती हैं, क्योंकि कांग्रेस खुद 30 में से केवल एक सीट जीत पाई है.
भारतीय राजनीति में, विधानसभा चुनावों को अक्सर लोकसभा चुनावों का संकेत माना जाता है. हालांकि दोनों में दांव पर लगे मुद्दे अलग-अलग होते हैं, फिर भी वे राजनीतिक सोच पर गहरा असर डालते हैं. कुल मिलाकर, 2026 के चुनाव ने सभी राज्यों में भारतीय राजनीति की नई दिशा तय की है. अब देखना होगा कि क्या BJP 2029 तक दक्षिण भारत में अपनी पैठ बढ़ा पाएगी? क्या विपक्ष एकजुट हो पाएगा? क्या कांग्रेस पार्टी फिर से मजबूत होकर उभरेगी? और क्या बीजेपी की बंगाल जीत उसे 400 पार दिला पाएगी?
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समाचार स्रोत: पीटीआई
