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2050 तक भारत बन जाएगा बूढ़ों का देश!

by Live India
2050 तक भारत बन जाएगा बूढ़ों का देश!

भारत की वृद्ध जनसंख्या: भारत 145 करोड़ की जनसंख्या के साथ दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है. विश्व की कुल आबादी का 18 प्रतिशत हिस्सा भारत में है, लेकिन इसके बावजूद भारत का प्रजनन दर लगातार कम होता जा रहा है, जो चिंता का विषय है. कुछ राज्यों में नौबत यह है कि राज्य सरकारों को ज्यादा बच्चे पैदा करने की स्कीम चलानी पड़ रही है. किसी भी देश का विकास मुख्य रूप से उसकी युवा आबादी पर निर्भर करता है और यह कम होने पर अर्थव्यवस्था और समाजिक व्यवस्था पर संकट आ सकता है. अगर लगातार भारत का फर्टिलिटी रेट कम होता रहा तो, यह भारत के लिए एक खतरा साबित हो सकता है.

स्पेसएक्स के CEO एलन मस्क ने भी भारत के घटते फर्टिलिटी रेट पर बात की है. उन्होंने ने एक्स पर पर एक पोस्ट में कहा, “भारत का बर्थ रेट रिप्लेसमेंट से नीचे गिर गया है. उन्होंने मीडिया आउटलेट AF पोस्ट के डेटा का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि भारत का फर्टिलिटी रेट देश के इतिहास में पहली बार रिप्लेसमेंट रेट से इतना नीचे गिर गया है. गृह मंत्रालय के तहत रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त द्वारा जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के मुताबिक, सिर्फ एक दशक में भारत का फर्टिलिटी रेट 2.3 के TFR (टोटल फर्टिलिटी रेट) से घटकर 1.9 हो गया है. वहीं, दिल्ली का फर्टिलिटी रेट अब 1.2 है, जो फिनलैंड से भी कम है.” यानी अब भारतीय कपल दो बच्चों से भी कम पैदा कर रहे हैं. 2023 में जारी संयुक्त राष्ट्र की इंडिया एजिंग रिपोर्ट में और भी चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं. इसके मुताबिक, साल 2050 तक भारत में अति-वृद्ध लोगों की जनसंख्या में 279 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी.

पहले समझें क्या है रिप्लेसमेंट लेवल रेट

अगर एक महिला दो बच्चों को जन्म देती है, तो आबादी के लिहाज से वे अपने माता-पिता को रिप्लेस कर देंगे. इसलिए वैश्विक रिप्लेसमेंट लेवल रेट 2.1 है. रिप्लेसमेंट लेवल रेट एक औसत दर है, जो किसी देश की आबादी में बिना बदलाव किए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाने के लिए जरूरी होता है. वहीं किसी देश में औसतन एक महिला कितने बच्चों को जन्म देती है, उसे उस देश की प्रजनन दर कहा जाता है. देश का प्रजनन दर रिप्लेमेंट दर से जितना ज्यादा होगा उतनी जनसंख्या वृद्धि होगी और युवाओं की संख्या बढ़ेगी. वहीं अगर किसी देश का प्रजनन दर रिप्लेसमेंट दर से कम है, तो वहां बच्चे कम पैदा हो रहे हैं और धीरे-धीरे वहां बुजुर्ग जनसंख्या बढ़ेगी.

भारत में लगातार घट रही प्रजनन दर

भारत की कुल प्रजनन दर पहली बार 2019 में रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे आई थी. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 रिपोर्ट पता चला कि भारत का फर्टिलिटी रेट घटकर 2.0 हो गया है, जो (2.1) से कम है. अगर हम गृह मंत्रालय की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की हालिया रिपोर्ट को देखें, तो 2023 में यह प्रजनन दर घटकर 1.9 हो गई है और अब तक बरकरार है.

वर्ष TFR (लगभग)
1950 5.7
1960 5.9
1970 5.6
1980 4.8
1990 4.0
2000 3.4
2010 2.6
2020 2.1
2023 2.0
2024 1.9

इन राज्यों में फर्टिलिटी रेट सबसे कम

आपने फिल्मों या सरकारी अस्पतालों में ‘हम दो हमारे दो’ का नारा जरूर सुना या पढ़ा होगा. यह भारत सरकार द्वारा 1966 में दिया गया था, ताकि भारत की बढ़ती आबादी को कंट्रोल किया जा सके. लेकिन अब हालात यह है कि भारत के कुछ राज्यों में ज्यादा बच्चों के जन्म को बढ़ावा देने के लिए मुफ्त सुविधाएं दी जा रही हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली- 1.2, केरल-1.3 और आंध्र प्रदेश- 1.4, जैसे बहुत ज़्यादा विकसित राज्यों में फर्टिलिटी रेट बहुत कम है, जिससे जल्द ही बुज़ुर्गों पर निर्भरता का संकट पैदा होने का खतरा है.

भारत में केवल 6 राज्यों का फर्टिलिटी रेट रिप्लेसमेंट रेट से ज्यादा है. बिहार का प्रजनन दर 3.0 है यानी यहां एक महिला 3 बच्चों को जन्म दे रही है. वहीं दूसरे नंबर पर मेघालय है, जहां प्रजनन दर 2.91 है. उत्तर प्रदेश में 2.35, झारखंड में 2.26 और मणिपुर में प्रजनन दर 2.17 है. वहीं मध्य प्रदेश की प्रजनन दर 2.4 से घटकर 2.1 पर आ गई है जो रिप्लेसमेंट रेट के बराबर है. इस हिसाब से, भारत के 28 में 22 राज्यों में प्रजनन दर रिप्लेसमेंट रेट से कम है.

सिक्किम और आंध्र प्रदेश में ज्यादा बच्चे करने को बढ़ावा दे रही सरकार

आंध्र प्रदेश सरकार ने घटती प्रजनन दर को सुधारने के लिए हाल ही में नई स्कीम लॉन्च की है, जिसके तहत दूसरे, तीसरे और चौथे बच्चे को जन्म देने पर सरकार द्वारा पैसे दिए जाएंगे. मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने ऐलान किया है कि दूसरे बच्चे के जन्म पर 25 हजार रुपए, तीसरे बच्चे के जन्म पर 30 हजार रुपए और चौथे बच्चे के जन्म पर 40 हजार रुपए की राशि दी जाएगी.

वहीं, सिक्किम में दूसरा बच्चा पैदा करने पर सरकारी महिला कर्मचारियों की सैलरी में बढ़ोतरी की जाती है. इसी तरह तीसरे बच्चे पर डबल बढ़ोतरी की जाती है. सरकारी महिला कर्मचारियों को एक साल की मैटरनिटी लीव दी जाती है और पुरुषों को 30 दिन की. इसके अलावा जो कपल माता-पिता नहीं बन पा रहे हैं, उन्हें IVF (टेस्ट ट्यूब बेबी) के लिए 3 लाख रुपए की सहायता राशि दी जाती है.

2050 तक भारत में दोगुने से अधिक हो जाएगी बूढ़ी आबादी

2023 में जारी यूनाइटेड नेशंस की इंडिया एजिंग रिपोर्ट कई चौंकाने वाले खुलासे करती है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक, भारत की 20.8 प्रतिशत आबादी बूढ़ी होगी. बूढ़ी का मतलब है 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोग. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2010 से देश में बुज़ुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है, जिससे 15 साल से कम उम्र के लोगों की हिस्सेदारी कम हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, 1 जुलाई 2022 तक देश में बुजुर्गों की जनसंख्या 14.9 करोड़ थी, जो कुल आबादी का 10.5 प्रतिशत थी, लेकिन 2050 तक भारत में बुज़ुर्गों की जनसंख्या 34.7 करोड़ तक पहुंच सकती है, जो भारत की कुल आबादी का 20.8 प्रतिशत होगा.

वहीं इस सदी के अंत तक यानी साल 2100 तक का अनुमान लगाया जाए, तो भारत की 36 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या बुजुर्ग हो जाएगी. रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2022 और 2050 के बीच भारत की आबादी 18 प्रतिशत बढ़ेगी, लेकिन बुज़ुर्गों की आबादी 134 प्रतिशत बढ़ जाएगी. वहीं, 80 साल से ज्यादा उम्र की जनसंख्या में 279 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है.

जापान के हालात

दुनिया में मोनाको और जापान दुनिया के सबसे ज्यादा बूढ़ी आबादी वाले देश हैं. मोनाको में 36.2% आबादी 65 साल से ज्यादा उम्र की है. वहीं जापान की 29.8 प्रतिशत जनसंख्या 65 साल से ज़्यादा उम्र की हैं. इन देशों में बच्चों की संख्या कम हो रही है, जबकि बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ रही है. वहां अब 100 साल तक जीना आम बात हो गई है. जापान में औसत उम्र 84 साल तक पहुंच गई है। जापान में फर्टिलिटी रेट 1.15 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है. इसका कारण कम जन्म दर, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, शहरीकरण और महंगाई है.

भारत में बच्चे पैदा करने से क्यों कतरा रहे लोग

पहले लोग 3-4 या उससे ज्यादा बच्चे पैदा करते थे, लेकिन अब ज्यादातर कपल केवल दो बच्चे ही चाहते हैं और कुछ तो केवल एक. इसके कई कारण हैं. बदलते समय के साथ महंगाई बढ़ रही है. बच्चों की पढ़ाई- लिखाई समेत खान-पान और स्वास्थ्य सुविधाओं का खर्च भी बढ़ रहा है. लोग अब संख्या के बजाय बच्चों के भविष्य पर ध्यान दे रहे हैं. मिडिल क्लास लोग मानते हैं कि कम बच्चे होंगे तो वे उन्हें बेहतर शिक्षा और जीवन स्तर दे पाएंगे. इसके अलावा भारत में महिलाओं की साक्षरता और वर्कफोर्स में भागीदारी तेजी से बढ़ रही है. कई महिलाएं सोचती हैं कि प्रेग्नेंसी और बच्चों की देखभाल के कारण उनके करियर पर असर पड़ेगा. एक और बड़ा बदलाव है शहरों में जॉइंट फैमिली का टूटना और न्यूक्लियर फैमिली का बढ़ना. पहले दादा-दादी या दूसरे रिश्तेदारों के सपोर्ट से बच्चों को पालना आसान था, लेकिन अब शहरों में अकेले रहने वाले कामकाजी माता-पिता के लिए बिना फैमिली सपोर्ट या महंगे डेकेयर के साथ बच्चों को पालना एक बड़ी चुनौती है. इन सब कारणों से अब लोग कम बच्चे पैदा करना ही बेहतर समझते हैं.

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