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मानसूनी वर्षा : देशभर में मानसून की बारिश का इंतजार किया जा रहा है, लेकिन इस बार मानसून की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ रही है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि सिर्फ एल नीनो ही नहीं, बल्कि कई अन्य मौसमीय कारक भी बारिश की राह में बाधा बन रहे हैं. इसका असर अब खेतों से लेकर बाजार और आम आदमी की रसोई तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है. भारत की लगभग 50 प्रतिशत कृषि भूमि आज भी बारिश पर निर्भर है। ऐसे में यदि मानसून कमजोर रहता है या लंबे समय तक बारिश की कमी बनी रहती है तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है. कई राज्यों में किसान खरीफ फसलों की बुवाई के लिए अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं.
कई राज्यों में कृषि को खतरा
गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और अन्य कृषि प्रधान राज्यों में बारिश की सुस्त रफ्तार किसानों की चिंता बढ़ा रही है. विशेषज्ञों के मुताबिक बारिश की कमी का सबसे बड़ा असर तिलहन, दलहन, सब्जियों और फलों के उत्पादन पर देखने को मिल सकता है. मुंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी और कपास जैसी फसलें पर्याप्त वर्षा पर निर्भर रहती हैं. यदि इन फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है तो खाद्य तेलों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है. इसका असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तेल से बनने वाले अनेक खाद्य उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं.
सब्जियों के बढ़ सकते हैं दाम
आर्थिक जानकारों का मानना है कि भारत में महंगाई का सबसे बड़ा जोखिम केवल कच्चे तेल की कीमतें नहीं हैं, बल्कि मानसून भी है. हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी देखने को मिली है. अमेरिका-ईरान के बीच तनाव कम होने और वैश्विक आपूर्ति में सुधार की वजह से तेल बाजार को राहत मिली है. इसके बावजूद यदि देश में बारिश सामान्य से कम रहती है तो खाद्य महंगाई बढ़ सकती है. दरअसल, भारत के महंगाई सूचकांक में खाद्य पदार्थों का योगदान काफी अधिक है. अनाज, दालें, सब्जियां, फल और खाद्य तेल आम परिवारों के मासिक बजट का बड़ा हिस्सा होते हैं. यदि कृषि उत्पादन घटता है तो बाजार में आपूर्ति कम होगी और कीमतें बढ़ना लगभग तय माना जाता है.
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सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ सकता है, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन और दैनिक जरूरतों पर खर्च होता है. सब्जी बाजार के व्यापारियों का भी मानना है कि यदि अगले कुछ सप्ताह तक पर्याप्त बारिश नहीं होती तो सब्जियों की आवक प्रभावित हो सकती है. टमाटर, प्याज, हरी सब्जियां और अन्य कृषि उत्पादों के दाम बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. इसका असर घरेलू बजट पर साफ दिखाई देगा.
कृषि के लिए मानसून बहुत महत्वपूर्ण
गुजरात जैसे कृषि आधारित राज्य के लिए भी मानसून बेहद महत्वपूर्ण है. कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन राज्य की आर्थिक गतिविधियों और ग्रामीण आय पर सीधा प्रभाव डालता है. यदि बारिश की कमी के कारण उत्पादन घटता है तो कृषि विकास दर पर भी असर पड़ सकता है. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और उससे जुड़े कई व्यवसाय प्रभावित हो सकते हैं. हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी मानसून पूरी तरह कमजोर नहीं पड़ा है. एल नीनो के अलावा कुछ अन्य मौसमी परिस्थितियां इसकी प्रगति को प्रभावित कर रही हैं. यदि आने वाले दिनों में अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं तो मानसून दोबारा सक्रिय हो सकता है और कई क्षेत्रों में अच्छी बारिश दर्ज की जा सकती है. फिलहाल किसानों, व्यापारियों और आम लोगों की निगाहें आसमान पर टिकी हैं. क्योंकि इस बार सवाल सिर्फ बारिश का नहीं, बल्कि खेती, महंगाई और करोड़ों परिवारों की आर्थिक स्थिति का भी है.
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