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ईरान-अमेरिका मध्यस्थता: 1989 में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी के अंतिम संस्कार में भी भारत की तरफ से प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति शामिल नहीं हुए थे. अब जब इसी महीने 9 जुलाई को ईरान के सर्वोच्च नेता रहे अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई का अंतिम संस्कार है तो उसमें भी कोई बड़े नेता शामिल नहीं होने जा रहा है. दूसरी तरफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के जाने की खबर है.
पाकिस्तान ने दोनों को किया संतुलित
पाकिस्तान उस वक्त भी अमेरिका और ईरान का सबसे भरोसेमंद साथी था और आज भी वह उसी भूमिका में है. मिडिल ईस्ट में भीषण जंग शुरू होने के बाद ईरान और अमेरिका के बीच में मध्यस्थता करवाने वाला भी पाकिस्तान है. ऐसे में पिछली बार की तरह इस बार भी पाकिस्तान ने दोनों ताकतों के साथ चलना तय माना है. बात यही तक नहीं पाकिस्तान ऐतिहासिक रूप से सऊदी अरब के करीबी होने के बावजूद भी ईरान से अपने अच्छे रिश्ते बनाने में कामयाब रहा है. वर्तमान की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान एक साथ ईरान और अमेरिका दोनों का भरोसा जीतने में कामयाब रहा है. हालांकि, तेहरान और वाशिंगटन एक-दूसरे को सबसे ज्यादा नापसंद करते हैं.
भौगोलिक स्थिति बनी गॉड गिफ्ट
वहीं, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिफ मुनीर की तारीफ ईरान और अमेरिका दोनों कर रहे हैं. इस हिसाब से देखा जाए तो पाकिस्तान की डिप्लोमेसी कामयाब होती हुई दिखती है. दूसरी तरफ ईरान के मामले में भारत अभी तक निष्पक्ष रहा है. पीएम मोदी ने ईरान पर अमेरिका और इजरायली हमले से ठीक पहले तेल अवीव का भी दौरा किया था. साथ ही भारत ने ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों की निंदा भी नहीं की. इसी बीच ट्रंप प्रशासन ने कई ऐसे फैसले लिए जिसने मोदी सरकार को काफी असहज महसूस करवाया है. बता दें कि पाकिस्तान की ऐसी भौगलिक स्थिति हैं कि उसे रणनीतिक रूप से काफी महत्व दिया जाता है. वह ईरान, अफगानिस्तान और गल्फ के पास है और अमेरिका के खिलाफ फैसले लेने के बाद भी उसका करीबी साबित हो जाता है. पाकिस्तान तो कई बार धमकी देता है कि अगर उसकी मदद नहीं की गई तो वह अपना पाला बदलकर चीन की गोद में बैठ जाएगा.
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संवाद के लिए बनाया एक प्लेटफॉर्म
पाकिस्तान ने इजरायल को बिल्कुल भी भाव न देकर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को खत्म करवाकर दोनों के बीच में संवाद के लिए एक प्लेटफॉर्म खड़ा किया. वहीं, ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई में भारत के रुख को तेहरान के पक्ष में नहीं देखा गया. इसके बाद दुनिया भर में संकेत गया कि इस युद्ध में भारत इजरायल और अमेरिका के करीब खड़ा है. अभी भारत के लिए गल्फ का क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह अपने जरूरत का 45 प्रतिशत क्रूड ऑयल, 66 फीसदी एलएनजी और 90 फीसदी एलपीजी इसी क्षेत्र से आयात करता है. इसके अलावा गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) में छह देशों में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं. इन सभी लोगों का135 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिलता है. साथ ही पाकिस्तान इजरायल के अस्तित्व को नकारता है और खुलकर अपनी बात ईरान के पक्ष में रखता है. इसके बाद भी अमेरिका पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर आता है और इस मध्यस्थता के लिए तो उसकी तारीफ में खूब कसीदे भी पढ़ें हैं.
भारत से कहां पर हो गई चूक?
इसी बीच अब सोशल मीडिया पर सवाल खड़ा किया जा रहा है कि भारत की तरफ से कूटनीतिक स्तर पर कहां पर चूक हो गई. क्या भारत को ईरान के पक्ष में अपनी बात रखनी चाहिए थी? आपको बताते चलें कि बीते करीब तीन दशक से गल्फ कंट्री में भारत ईरान और इजरायल के बीच संतुलित रिश्ते रखता आया है. भारत ने हमेशा इन दोनों के विवाद से अलग हटकर अपने रिश्तों को बनाया है और दोनों देशों को संतुलित भी किया है. साथ ही डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से भारत की अपनी मल्टी-अलाइनमेंट नीति काफी दबाव में आई है. कहा जाता है कि भारत की यह शक्ति तभी सफल होगी जब अमेरिका हर मामले में भारत का समर्थन करेगा. ट्रंप प्रशासन में एक तरह का दबाव हमेशा बना रहा है कि भारत एक पक्ष चुने और ट्रंप ब्रिक्स देशों को भी दमकी देते रहे हैं. भारत ब्रिक्स के सह-संस्थापक देशों में से एक रहा है.
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पाकिस्तान को मिली बढ़त!
ईरान के इराक, लेबनान, सीरिया और यमन गहरे रणनीतिक रिश्ते हैं और बड़े नेटवर्क भी हैं. वहीं, तमाम हमलों के बाद भी ईरान ने इस बार भी अमेरिका के सामने सरेंडर नहीं किया. यही वजह है कि चीन भी ईरान के साथ अपने रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करने में लगा है. इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि ईरान के पास भारी मात्रा में कच्चा तेल और गैस है. चीन को यहां से सस्ती कीमतों में भारी संसाधन मिलता रहा है. कई विशेषज्ञ मान रहे हैं कि मिडिल ईस्ट युद्ध को शांत करवाकर कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान एक मजबूत देश बनकर उभरा है. पाकिस्तान अब इस युद्ध में मध्यस्थता करवाकर वैश्विक स्तर पर अपनी छवि को सुधारने और अपनी वास्तविक क्षमता से अधिक प्रभाव हासिल करने के लिए लगातार भारत की परेशानी को बढ़ाने में लगा है. साथ ही अमेरिका और यूरोप अफगानिस्तान युद्ध में पाकिस्तान दोहरा रवैये से परेशान हो गए थे. हालांकि, इस युद्ध को शांत करने में पाकिस्तान की भूमिका के बाद दोनों पक्ष खुश हो गए हैं.
क्या कश्मीर को पाक बनाएगा मुद्दा
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान अपने नए आत्मविश्वास का इस्तेमाल कश्मीर पर वैश्विक राय को प्रभावित करने के लिए कर रहा है. वहीं, इस्लामाबाद चीन के समर्थन से अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में लगा है. इस युद्ध ने ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक फैले भारत के रणनीतिक रिश्तों को झकझोर करके रख दिया है. हालांकि, काबुल के नई दिल्ली के साथ रिश्ते काफी मजबूत हैं और कई सेक्टर में दोनों मिलकर काम कर रहे हैं. साथ ही अभी भारत ईरान-रूस-चीन की धुरी पर नहीं झुक सकता है. वहीं, अगर प्रधानमंत्री मोदी अपनी इजरायल यात्रा को नहीं टाल सकते थे तो अपने मित्र देश को इस युद्ध में खड़े होने से रोक सकते थे. अगर भारत को खुद को एक बड़ी शक्ति के रूप में सम्मानित देखना चाहता है तो उसको विश्वसनीय तरीके से अपनी रक्षा करना होगी और उन जिम्मेदारी का भी निर्वाहन करना होगा जिसके लिए महाशक्तियां एक साथ आती हैं.
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नई धारणा पर विचार करने की जरूरत
कई रणनीतिकार इस बात को लंबे समय से मानते रहे हैं कि इजरायल को लेकर अमेरिका की नीति हमेशा से ही स्थिर और अपरिवर्तनीय रही है. इसका मतलब है कि अमेरिका हमेशा से ही इजरायल का समर्थन करता आया है और वह इसके लिए अडिग भी दिखता है. लेकिन अब अमेरिका को इस आइडिया पर फिर से विचार करने की जरूरत है. वहीं, हाल ही में अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेद किसी से छिपे नहीं हैं. यह दोनों के बीच में सामान्य कूटनीतिक टकरार नहीं है बल्कि डोनाल्ड ट्रंप की व्यक्तिगत शैली और अप्रत्याशित स्वभाव को ध्यान में रखते हुए यह वास्तविक मतभेद भी दिखते हैं. ट्रंप का इस तरह से सार्वजनिक बयान देने का मतलब है कि पश्चिम एशिया में अमेरिका की छवि काफी बदली है और उसे भी इजरायल की तरह घातक नेता के रूप में देखा जा रहा है. इसके अलावा दुनिया भर में अमेरिका की काफी फजीयत भी हो रही है और इसका आरोपी सिर्फ इजरायल ही है.
मोदी और पेजेशकियान में हुई बातचीत
बता दें कि मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिकी युद्ध से पैदा हुआ संकट फिलहाल के लिए शांत हो गया है. अब दोनों पक्षों के बीच 14 प्वाइंट का प्रस्ताव तैयार किया गया है और 60 दिनों में इन सभी मुद्दों पर कई दौर की बातचीत होगी. हालांकि, इन 60 दिनों में कोई सीधी और बड़ी जंग नहीं होगी. इसी बीच ईरान ने समुद्री गलियारे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोल दिया है. अमेरिका ने उसको अंतरराष्ट्रीय मार्केट में तेल बेचने की अनुमति दे दी है. वहीं, इस युद्ध को अस्थायी रूप से शांत करवाने में पाकिस्तान की भूमिका अहम रही है और वैश्विक स्तर पर अपनी छवि को भी सुधारने में लग गया है. अब इस विश्वसनीयता को कहां पर कैश करवाएगा इसके बारे में किसी को नहीं पता है. लेकिन कहा जा रहा है कि वह कश्मीर को मुद्दा बनाकर वैश्विक दुनिया का ध्यान बदलवाने की कोशिश करेगा. इसी बीच भारत कहां पर खड़ा इसको लेकर दुनिया में चर्चा हो रही है और ईरान के मुद्दे पर नहीं बोलने को लेकर उसकी आलोचना भी हो रही है.
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