Home News मकर संक्रांति और एकादशी हैं एक ही दिन, जानें शुभ मुहूर्त

मकर संक्रांति और एकादशी हैं एक ही दिन, जानें शुभ मुहूर्त

by Live India
मकर संक्रांति और एकादशी हैं एक ही दिन, जानें शुभ मुहूर्त

Makar Sankranti 2026: इस साल मकर संक्रांति और एकादशी के दिन ही हैं. यहां जानें मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त कब है दान-पुण्य कैसे करना है.

7 जनवरी, 2026

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति का त्योहार हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है, जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं. हिंदू धर्म में इसका बहुत महत्व है. इस दिन से सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू करता है, इसलिए मकर संक्रांति को उत्तरायणी भी कहा जाता है. इस साल मकर संक्रांति एकादशी के दिन ही पड़ रही है, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है. यह संयोग 22 साल बाद आया, जब एकादशी और मकर संक्रांति एक ही दिन हैं. चलिए जानते हैं इस साल मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त कब है दान-पुण्य कैसे करना है.

surya arghya

कब है मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त

इस दिन सूर्यदेव की पूजा की जाती और दान किया जाता है. सभी कार्यों को उसके शुभ मुहूर्त में करने से उसका फल मिलता है. 14 जनवरी को सूर्य दोपहर 3:07 बजे धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं. इस बार मकर संक्रांति का महापुण्य काल दोपहर 3:07 से 6 बजे तक है. इस समय दान करना शुभ माना जाएगा. मकर संक्रांति के साथ एकादशी होने के कारण इस दिन दो शुभ मुहूर्त और हैं, जो सुबह 7:15 से 3:03 तक है. वहीं इस दिन स्नान करने का शुभ मुहूर्त सुबह 09:03 बजे से 10:48 बजे तक है.

किस चीज का दान करें

मकर संक्रांति के दिन पूजा-पाठ और दान-पुण्य का बहुत महत्व है. इस दिन आप सबसे पहले स्नान करके सूर्यदेव को जल अर्घ्य दें और इसके बाद घर के मंदिर पूजा करें. भगवान को भोग लगाने के बाद आप ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को दान करें. मकर संक्रांति के दिन तिल, गुड़, उड़द की दाल, चावल, नमक, हल्दी और घी का दान किया जाता है, क्योंकि यह गर्म रखता है और पौष्टिक होता है.

Makar sankranti Daan

गंगा स्नान का महत्व

मकर संक्रांति के दिन से रातें छोटी और दिन लंबे होने लगते हैं. लंबे दिनों का मतलब है ज़्यादा धूप. और छोटी रातों का मतलब है कम अंधेरा. इसलिए, मकर संक्रांति पर सूर्य की स्थिति में बदलाव को अंधेरे से रोशनी की ओर बढ़ना माना जाता है. इस दिन गंगा स्नान का भी बहुत महत्व होता है. माना जाता है कि सभी देवी-देवता रूप बदलकर प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर स्नान करने आते हैं. अगर आप गंगा में स्नान करने नहीं जा सकते तो पानी में गंगाजल मिलाकर भी स्नान कर सकते हैं.

यह भी पढ़ें- क्यों मोहमाया त्याग कर कल्पवास रखते हैं श्रद्धालु, जानें इस कठिन तपस्या का महत्व और नियम

Related Articles