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Bhawanipur Seat Political Journey: पश्चिम बंगाल की राजनीति में लगातार बदलाव हुए, लेकिन भवानीपुर विधानसभा सीटें, उन चुनिंदा सीटों में से है, जो इस बदलाव की पूरी कहानी को साफ तौर पर बयां करती हैं. चलिए जानते हैं पश्चिम बंगाल चुनाव में भवानीपुर सीट का महत्व क्या है.
22 मार्च, 2025
सामग्री की तालिका
- परिचय
- कांग्रेस का गढ़ बना भवानीपुर
- जब नक्शे से गायब हो गया भवानीपुर
- ऐसे शुरु हुआ भवानीपुर और ममता का रिश्ता
- दीदी बनाम बौदी की लड़ाई
- भवानीपुर छोड़ने पर ममता को लगा झटका
- भवानीपुर का वोटर समीकरण भी है खास
- भवानीपुर से कटे हजारों वोटर
- अगले चुनाव का इंतजार
परिचय
पश्चिम बंगाल में चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ चुनावी बिगुल बज चुका है. सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी कमर कस ली है और हमेशा की तरह आरोप-प्रत्यारोप का खेल भी शुरु हो गया है. पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. और 4 मई को विजेता की घोषणा की जाएगी. पश्चिम बंगाल का चुनाव इसलिए भी खास हो जाता है, क्योंकि यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र में बैठी बीजेपी के बीच कट्टर दुश्मनी देखने को मिलती है. पश्चिम बंगाल में कुल 293 विधानसभा सीटें हैं, लेकिन उनमें से सबसे बड़ी हॉट सीट है- भवानीपुर की, क्योंकि यह सीट मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की परंपरागत सीट रही है, जहां से उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत की थी और आज तक वे उसी सीट पर कायम हैं. चलिए जानते हैं पश्चिम बंगाल चुनाव में भवानीपुर सीट का महत्व क्या है.
कांग्रेस का गढ़ बना भवानीपुर
पश्चिम बंगाल की राजनीति में लगातार बदलाव हुए, लेकिन कुछ ही विधानसभा सीटें ऐसी हैं जो इस बदलाव की पूरी कहानी को साफ तौर पर बयां करती हैं. दक्षिण कोलकाता की भवानीपुर सीट उन्हीं में से एक है. यह सिर्फ एक चुनाव क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीति के उस लंबे सफर का प्रतीक है, जिसने कांग्रेस के दबदबे से लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उदय तक का दौर देखा है. आज यह सीट मुख्यमंत्री ममता का मजबूत गढ़ मानी जाती है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था. आजादी के बाद कई दशकों तक भवानीपुर कांग्रेस का गढ़ रहा. उस समय यह सीट राज्य की राजनीति के बड़े नेताओं का केंद्र हुआ करती थी. पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने यहां से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. बाद में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर भी यहां से जीत दर्ज की. इसके अलावा मीरा दत्ता गुप्ता और राथिन तालुकदार जैसे कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया. इस वजह से भवानीपुर को कांग्रेस का एक मजबूत शहरी गढ़ माना जाने लगा.
जब नक्शे से गायब हो गया भवानीपुर
भवानीपुर पर वामपंथियों ने भी एक बार सेंध लगाई थी. 1969 में, जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट कर दिया गया था, तब साधन गप्ता ने यहां से जीत हासिल की. वह खास तौर पर इसलिए भी जाने जाते हैं क्योंकि वे 1953 में भारत के पहले नेत्रहीन सांसद बने थे. उस समय बंगाल में यूनाइटेड फ्रंट सरकार थी, जिसमें बांग्ला कांग्रेस और CPI(M) शामिल थे. लेकिन यह सफलता ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी और भवानीपुर फिर से कांग्रेस के प्रभाव में लौट आया. 1972 में इस सीट के इतिहास में एक बड़ा बदलाव आया. परिसीमन के बाद भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र चुनावी नक्शे से ही गायब हो गया. इसके बाद लगभग चार दशकों तक यह सीट अस्तित्व में नहीं रही और केवल राजनीतिक यादों में ही बनी रही. लेकिन 2011 में जब नए सीमांकन के बाद इसे फिर से शुरू किया गया, तब पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी एक बड़ा बदलाव हो रहा था.
ऐसे शुरु हुआ भवानीपुर और ममता का रिश्ता
2011 का साल राज्य के लिए ऐतिहासिक था. इसी साल लेफ्ट फ्रंट के 34 साल पुराने शासन का अंत हुआ और तृणमूल कांग्रेस यानी TMC सत्ता में आई. भवानीपुर सीट भी इस बदलाव के साक्षी बनीं. इस सीट पर हुए पहले चुनाव में ममता बनर्जी ने अपने करीबी सहयोगी सुब्रत बख्शी को उम्मीदवार बनाया. बख्शी ने शानदार जीत दर्ज की और 64 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किए. उन्होंने CPI(M) के नारायण जैन को करीब 50,000 वोटों से हराया. इस जीत के तुरंत बाद बख्शी ने सीट खाली कर दी, ताकि ममता बनर्जी खुद यहां से चुनाव लड़ सकें. मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके लिए विधानसभा का सदस्य बनना जरूरी था. उपचुनाव में उन्होंने भारी जीत दर्ज की और करीब 77 प्रतिशत वोट हासिल किए. उन्होंने CPI(M) की नंदिनी मुखर्जी को 54,000 से ज्यादा वोटों से हराया. इस जीत के साथ भवानीपुर में उनका राजनीतिक आधार और मजबूत हो गया.
दीदी बनाम बौदी की लड़ाई
इसके बाद से भवानीपुर सीट TMC के कब्जे में ही बनी हुई है. कोलकाता के मेयर और मंत्री फिरहाद हकीम ने भी कहा है कि भवानीपुर उनके लिए सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि भरोसे और विकास की राजनीति का प्रतीक है. यहां के लोग बार-बार ममता बनर्जी की नीतियों पर भरोसा जताते आए हैं. 2016 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर एक दिलचस्प मुकाबला देखने को मिला. कांग्रेस और वामपंथी दलों ने गठबंधन किया और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता दीपा दासमुंशी को ममता बनर्जी के खिलाफ उतारा. इस चुनाव को “दीदी बनाम बौदी” की लड़ाई के रूप में प्रचारित किया गया. हालांकि, इस चुनावी मुकाबले का परिणाम ममता बनर्जी के पक्ष में ही गया. उन्होंने 65,520 वोट हासिल किए, जबकि दासमुंशी को केवल 40,219 हासिल कर पाईं. वहीं BJP उम्मीदवार चंद्र कुमार बोस तीसरे स्थान पर रहे.
भवानीपुर छोड़ने पर ममता को लगा झटका
2021 के विधानसभा चुनाव ने सभी को चौंका दिया. ममता बनर्जी ने भवानीपुर छोड़कर नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जहां उनका मुकाबला उनके पूर्व सहयोगी सुवेंदु अधिकारी से था. इस दौरान भवानीपुर सीट पर TMC ने सोवनदेब चट्टोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया. वहीं BJP ने अभिनेता रुद्रनिल घोष को मैदान में उतारा. घोष को 44,786 वोट मिले, जो इस सीट पर किसी विपक्षी उम्मीदवार के लिए सबसे ज्यादा थे, लेकिन वह करीब 28,000 वोटों से हार गए.
दूसरी तरफ नंदीग्राम में ममता बनर्जी को सुवेंदु अधिकारी से मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा. इस हार ने ममता बनर्जी को बड़ा झटका दिया. इसके बाद मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उन्हें किसी सीट से जीत हासिल करने जरूरत थी, जिस काण एक बार फिर भवानीपुर चर्चा में आया. चट्टोपाध्याय ने सीट खाली कर दी और उपचुनाव में ममता बनर्जी ने BJP की Priyanka Tibrewal के खिलाफ चुनाव लड़ा. उन्होंने इस चुनाव में 58,000 से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की और करीब 72 प्रतिशत वोट शेयर पाया. इस जीत ने भवानीपुर को उनका सबसे भरोसेमंद राजनीतिक गढ़ बना दिया.
भवानीपुर का वोटर समीकरण भी है खास
भवानीपुर सिर्फ राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी काफी विविधता वाला क्षेत्र है. यह इलाका कोलकाता नगर निगम के कई वार्डों से मिलकर बना है. यहां बंगाली मध्यम वर्ग के साथ-साथ बड़ी संख्या में हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय भी रहता है. इस क्षेत्र में प्रसिद्ध कालीघाट काली मंदिर भी स्थित है, जो शहर के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है. साथ ही, ममता बनर्जी का निवास भी इसी क्षेत्र में है.
अगर वोटर समीकरण की बात करें, तो यहां लगभग 42 प्रतिशत बंगाली हिंदू, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और करीब 24 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सामाजिक मिश्रण ममता बनर्जी की “अर्बन पॉपुलिज्म” वाली राजनीति के लिए परफेक्ट रहा है. राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती का कहना है कि भवानीपुर दक्षिण कोलकाता की बहु-सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है और ममता बनर्जी ने यहां अलग-अलग समुदायों के बीच एक व्यक्तिगत जुड़ाव बनाया है.
भवानीपुर से कटे हजारों वोटर
अगले चुनाव का इंतजार
BJP नेता सुकांता मजूमदार का कहना है कि अब पश्चिम बंगाल की राजनीति बदल रही है और जो सीटें पहले एकतरफा मानी जाती थीं, वहां भी अब कड़ी टक्कर देखने को मिल सकती है. भवानीपुर भी इससे अलग नहीं है. कुल मिलाकर, भवानीपुर विधानसभा सीट पश्चिम बंगाल की राजनीति के बदलते स्वरूप की मिसाल है. यह सीट कभी कांग्रेस का गढ़ थी, फिर लंबे समय तक गायब रही, और अब TMC का सबसे मजबूत किला बन चुकी है. लेकिन आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह किला पहले की तरह अडिग रहता है या इसे बीजेपी का उम्मीदवार भेद सकता है.
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समाचार स्रोत: पीटीआई
