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ईरान-अमेरिका डील: ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते का पहला दौर खत्म हो गया है. यह पूरी बातचीत स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में हुई और यह करीब 80 मिनट तक चली. इस बातचीत में पाकिस्तान और कतर की अहम भूमिका रही. बताया जा रहा है कि पहले दौर की चर्चा लेबनान को लेकर थी और अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर होगी. हालांकि, 60 दिनों तक ईरान अपना सामान अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच सकता है और इन 60 दिनों में दोनों देशों के बीच में जिन मुद्दों पर मतभेद हैं उनको लेकर गंभीर चर्चा होगी. हालांकि, अभी तक की परिस्थिति को देखते हुए लगता है कि इस बार कोई न कोई समझौता हो जाएगा.
टेक्नीकल लेवल पर हुई ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत के बाद 14-पॉइंट वाले मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर साइन किया गया. इस MoU पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान द्वारा साइन किया गया था. इस प्रस्ताव के तहत लेबनान समेत सभी मोर्चों पर तत्काल प्रभाव से सैन्य अभियानों को रोकने की बात कही गई. हालांकि, इजरायल अभी भी रुक-रुककर लेबनान पर हमला कर रहा है. इसके अलावा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को 60 दिनों के लिए व्यापारिक जहाजों की आवाजाही निशुल्क होगी. दूसरी तरफ जहां दुनिया भर के देशों ने इस डील से राहत की सांस ली है तो वहीं, इजरायल इस डील से नाखुश है. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लगातार इस डील को तोड़ने की कोशिश में है और वह इसके पीछे कई कारण भी बता रहे हैं.

एक-दूसरे की इच्छा के बिना कुछ नहीं करते
इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा है कि न तो वह और न ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप हर एक काम को एक-दूसरे की इच्छा के बिना नहीं करते हैं. उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर हमारी सेना दक्षिणी लेबनान में तैनात रहेगी. इसके अलावा आईडीएफ वहां पर तब तक मौजूद रहेगी जब तक उत्तर में रहने वाले हमारे लोग और नागरिकों की सुरक्षा पूरी तरह जरूरी नहीं हो जाती है. नेतन्याहू का बयान ऐसे समय भी आया है जब ट्रंप ने कहा है कि वह हमले को लेकर बीबी (नेतन्याहू) को समझाएंगे. हालांकि, अभी तक लेबनान पर हमले नहीं रोके गए और इसी बीच खबर भी सामने आई थी कि ईरान इस बातचीत से पीछे हट सकता है
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क्या लेबनान पर रुकेंगे हमले?
पिछले हफ्ते हुए जी-7 बैठक के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता बढ़ गया है. इस बार प्रस्ताव में स्पष्ट था कि लेबनान समेत सभी मोर्चों पर हमले रोक दिए जाएंगे. हालांकि, अभी भी इजरायल लेबनान पर हमले कर रहा है और इस दौरान कई लोगों की मौत भी हो चुकी है. समझौते के 14 प्वाइंट में कहा गया है कि ईरान, अमेरिका और उनके सहयोगी सैन्य अभियान को स्थायी रूप से खत्म करने की घोषणा करेंगे. वहीं, जी-7 बैठक के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की है और यह भी कह दिया कि इजरायल द्वारा लेबनान पर किए गए हमले गैर-जरूरी थे. ट्रंप ने इजरायल के बारे में यह भी कहा कि इजरायल, हिजबुल्लाह से काफी समय से लड़ रहा है और इसके कारण बहुत लोगों की जान जा रही है. ट्रंप ने कहा जब हम किसी की तलाश में होते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे इलाके को खत्म कर दिया जाए. साथ ही जहां पर इजरायल हमला कर रहा है वहां पर सिर्फ हिजबुल्लाह के लोग नहीं रहते हैं बल्कि आम लोग भी रहते हैं.
हालांकि, अप्रत्यक्ष रूप से इजरायल ईरान-अमेरिका के बीच हुए समझौते का विरोध कर रहा है और अभी तक उसने नाराजगी जाहिर की है. इसी बीच हम आपको बताने जा रहे हैं कि जहां एक तरफ इस समझौते से दुनिया भर के देश राहत की सांस ले रहे हैं तो दूसरी तरफ इजरायल इस समझौता का इतना विरोध क्यों कर रहा है? उसको क्या दुनिया में शांति पसंद नहीं है और क्या वह अपने क्षेत्र में शांति से रहना नहीं चाहता है. ऐसे ही विभिन्न सवाल हैं कि वह किसी खास शांति समझौते पर नहीं पहुंचना चाहता है. इसी बीच इजरायल ने खुद बताया है कि वह इस समझौते का धीमी आवाज में क्यों विरोध कर रहा है.

ये हैं वह मुख्य कारण
इजरायल को किया साइड लाइन
ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौता एक तरह प्रधानमंत्री नेतन्याहू के होश उड़े हुए हैं. इस समझौते ने नेतन्याहू को राजनीतिक रूप से मजबूत आधारों को खो दिया है. साथ ही उनको देश की सुरक्षा वाला मुद्दे को लेकर बुरी तरह फंसा दिया है. नेतन्याहू ने हमेशा से अपने आपको अमेरिका का करीबी बताया और खुद को एक ऐसे नेता कहा जिसका प्रभाव अमेरिकी लीडर्स पर है. हालांकि, वह यह भी दावा कर रहे हैं कि ईरान के साथ समझौते में उसको दरकिनार कर दिया गया और सार्वजनिक रूप से अपमान किया गया है.
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दूसरी तरफ ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि अमेरिका के बिना इजरायल कुछ नहीं कर सकता है. साथ ही मेरे बिना इजरायल कुछ नहीं कर पाता, क्योंकि दूसरे किसी राष्ट्रपति से उनको इस तरह का समर्थन नहीं मिल पाता. इजरायल के नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर इतामार बेन-ग्विर ने सोमवार को कहा कि हम ट्रंप के समझौते कतई नहीं बंधे हैं और न ही हम इस समझौते के साझेदार हैं. हमारी सुरक्षा पहली प्राथमिकता है.
क्या मजबूत स्थिति में है ईरान?
नेतन्याहू ने इस मुद्दे को भी जोर से उठाया है कि ईरान इजरायल की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है. अब सवाल यह है कि इजरायल की नीति खतरों को रोकने के बजाय उन्हें ख़त्म करने की थी. लेकिन इस समझौते से ईरान मजबूत स्थिति में आ गया है. अब नेतन्याहू के लिए भी यह सवाल आ गया है कि ईरान के साथ युद्ध को ऐसे मोड़ पर कैसे खत्म कर सकते हैं? हिजबुल्ला और ईरान के साथ लगातार टकराव के बीच इजरायल के अभी मुख्य दुश्मन खत्म नहीं हुए हैं, बल्कि ईरान में ज्यादा कट्टरपंथी नेताओं का कब्जा हो गया है. ईरान के इन नेताओं को इजरायल और अमेरिका का कोई डर नहीं है, बल्कि उनका मकसद है कि किसी तरह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर होने वाले समझौते पर साइन करवाए जाएं.
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नेतन्याहू को आम चुनाव ने डराया?
पिछले साल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामले में देश के राष्ट्रपति आइजैक हरजोग से औपचारिक तौर पर माफी की दरख़्वास्त की. नेतन्याहू ने एक वीडियो जारी करके बताया था कि वह चाहते हैं कि कानूनी प्रक्रिया अपने निष्कर्ष तक पहुंचे, लेकिन यह राष्ट्रीय हित में ठीक नहीं रहेगा. अब घरेलू राजनीति में कानून प्रक्रिया का सामना कर रहे नेतन्याहू नहीं चाहेंगे कि वह ईरान के सामने इस तरह से झुक जाएं या फिर यह युद्ध इतनी आसानी से शांत हो जाए.

ईरान को मिलेगा आर्थिक लाभ
ईरान और अमेरिका के बीच होने वाला यह शांति समझौता किसी एक आर्थिक मुद्दों की तरफ भी रुख कर रहा है. 60 दिनों तक हुए शांति समझौते में ईरान को इस बात की इजाजत मिल गई है कि वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना क्रूड ऑयल और गैस बेच सकता है. ईरान इन रास्तों का वर्षों से इंतजार कर रहा था और अगर आगे भी उसे ऐसी छूट मिलती है तो वह अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में तेजी लाने की पूरी कोशिश करेगा.
इसके अलावा अमेरिका ने ईरान की फ्रीज की गई संपत्ति का एक हिस्सा जारी कर दिया है. साथ ही अब 60 दिनों में होने वाली बातचीत में 300 अरब डॉलर तक के दीर्घकालिक विकास के ढांचे पर भी चर्चा होगी. दूसरी तरफ इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है कि ईरान को इन फैसले को आर्थिक ताकत मिलेगी. वहीं, ईरान ने इस युद्ध में यह साबित कर दिया है कि अगर उसे कोई बेवजह परेशान करने की कोशिश करेगा तो वह दुनिया की बड़ी ऊर्जा मात्रा को रोक देगा और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से किसी भी मालवाहक को गुजरने तक नहीं देगा. वहीं, युद्ध खत्म होने के बाद ईरान दुनिया में एक अलग रूप में उभर कर सामने आएगा.

वहीं, इजरायल ने जिस देश पर प्लान बनाकर 28 फरवरी को हमला किया था. उसे 300 अरब डॉलर का पैकेज मिलेगा यह तो नेतन्याहू के लिए राहत भरी खबर नहीं है. ईरान के साथ अभी पूरी तरह शर्त में नहीं जोड़ा गया है कि अमेरिका जिन 300 अरब डॉलर को देने वाला है वह ईरान किस रूप में इस्तेमाल करेगा. अगर ईरान ने इन करोड़ों रुपये का इस्तेमाल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के अलावा मिसाइल बनाने में किया तो यह इजरायल के लिए भविष्य में बड़ी चुनौती बन सकता है.
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