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लड़का: देशभर में मानसून की दस्तक के साथ मौसम का मिजाज लगातार बदलता नजर आ रहा है. कहीं भीषण गर्मी लोगों को परेशान कर रही है तो कहीं अचानक हो रही भारी बारिश जनजीवन को प्रभावित कर रही है. मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार अल नीनो और जलवायु परिवर्तन यानी क्लाइमेट चेंज का संयुक्त प्रभाव देखने को मिल सकता है. इसका असर गुजरात समेत देश के कई राज्यों में मानसून के स्वरूप पर पड़ने की संभावना है.
जनवरी 2027 तक अल नीनो का असर
प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से करीब 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने पर अल नीनो की स्थिति बनती है. यह एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण इसका प्रभाव और अधिक तीव्र होता जा रहा है. मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जून 2026 से जनवरी 2027 तक अल नीनो का असर बना रह सकता है, जिसका सीधा प्रभाव बारिश, तापमान और हीटवेव की घटनाओं पर पड़ेगा. मौसम वैज्ञानिक डॉ. चिराग शाह के अनुसार अल नीनो के कारण इस वर्ष देशभर में वर्षा का वितरण असमान रहने की संभावना है. यानी कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश होगी जबकि कई इलाकों में वर्षा की कमी देखी जा सकती है. गुजरात भी इस बदलाव से अछूता नहीं रहेगा.
गुजरात में क्या रहेगा असर?
गुजरात के लिए मानसून का यह सीजन चुनौतीपूर्ण और असामान्य दोनों हो सकता है. मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि राज्य में औसतन लगभग 85 प्रतिशत मानसूनी वर्षा दर्ज हो सकती है. हालांकि यह आंकड़ा पूरे राज्य की तस्वीर नहीं बताता, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश का वितरण काफी असमान रहने की संभावना है.
दक्षिण गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ, दाहोद और पंचमहाल जैसे क्षेत्रों में सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है. वहीं मध्य गुजरात और उत्तर गुजरात के कई जिलों में अपेक्षाकृत कम बारिश की आशंका जताई जा रही है. इसका मतलब यह है कि एक ही राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बाढ़ और जल संकट जैसी विपरीत परिस्थितियां एक साथ देखने को मिल सकती हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि गुजरात में पिछले कुछ वर्षों से मानसून का पारंपरिक स्वरूप बदलता जा रहा है. पहले जहां लगातार कई दिनों तक हल्की से मध्यम बारिश होती थी, वहीं अब कम दिनों में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं. इससे शहरी क्षेत्रों में जलभराव, सड़कें धंसने और बाढ़ जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं.
बदल रहा है बारिश का पैटर्न
जलवायु वैज्ञानिक इसे “स्वैपिंग पैटर्न” का नाम दे रहे हैं. इसका अर्थ है कि जिन क्षेत्रों में पहले कम बारिश होती थी, वहां अब अत्यधिक वर्षा हो रही है, जबकि जहां अच्छी बारिश सामान्य मानी जाती थी वहां कमी देखने को मिल रही है.
गुजरात में भी पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े यही संकेत देते हैं. कच्छ और सौराष्ट्र के कई हिस्सों में अचानक भारी बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं, जबकि कुछ जिलों में लंबे समय तक बारिश का इंतजार करना पड़ता है. यह बदलाव केवल अल नीनो का परिणाम नहीं है बल्कि जलवायु परिवर्तन भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है.
किसानों के लिए बढ़ सकती है चुनौती
गुजरात की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है और मानसून का सीधा संबंध किसानों की आय से जुड़ा हुआ है. यदि खरीफ फसलों की बुआई के समय पर्याप्त बारिश नहीं होती और बाद में अत्यधिक वर्षा होती है, तो किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है.
कम बारिश के कारण सिंचाई पर खर्च बढ़ेगा, जबकि बाद में होने वाली अत्यधिक बारिश फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है. इससे उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में खाद्यान्न उत्पादन पर असर पड़ सकता है, जिसका प्रभाव बाजार कीमतों पर भी दिखाई देगा.
शहरों के लिए भी बढ़ी चिंता
गुजरात के अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा और राजकोट जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहरों के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. कम समय में अत्यधिक बारिश होने की घटनाओं के कारण शहरी बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है.
विशेषज्ञ बताते हैं कि अब केवल कुल वर्षा का आंकड़ा महत्वपूर्ण नहीं रह गया है, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि बारिश कितने समय में और किस तीव्रता से हो रही है. यदि कुछ घंटों में ही पूरे महीने जितनी बारिश हो जाए तो ड्रेनेज सिस्टम और शहरी व्यवस्थाएं जवाब दे सकती हैं.
भविष्य की तैयारी जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में गुजरात को अपनी कृषि नीतियों, जल प्रबंधन योजनाओं और शहरी नियोजन को बदलते मौसम के अनुरूप ढालना होगा. केवल राज्य स्तर पर औसत वर्षा का अनुमान पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जिला और स्थानीय स्तर पर मौसम के पैटर्न को समझना भी उतना ही जरूरी होगा.
स्पष्ट है कि अल नीनो और क्लाइमेट चेंज के प्रभाव के बीच गुजरात में मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. बारिश का समय, मात्रा और क्षेत्रीय वितरण अब पहले जैसा नहीं रहा. ऐसे में मौसम की नई चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, बेहतर योजना और स्थानीय स्तर पर तैयारी ही सबसे प्रभावी उपाय साबित होगी.
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