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सोशल मीडिया: भारत में सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर गंभीर और नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश में लगभग 40 करोड़ बच्चे इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं, जिनमें से 76 प्रतिशत स्मार्टफोन उपयोगकर्ता बच्चे किसी न किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं. यह स्थिति भारतीय समाज के लिए एक ‘खामोश महामारी’ बन गई है, जो बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेल रही है.

इस उम्र के बच्चे सबसे अधिक कर रहे उपयोग
भारत में यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले बच्चों की उम्र चौंकाने वाली है.
- 9 से 17 वर्ष (सबसे सक्रिय समूह): इस आयु वर्ग के लगभग 49 प्रतिशत बच्चे प्रतिदिन 3 घंटे या उससे अधिक समय इंटरनेट और सोशल मीडिया रील देखने में बिता रहे हैं.
- 13 साल से कम उम्र के बच्चे: नियमों के मुताबिक, ज्यादातर प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने की न्यूनतम उम्र 13 साल है. इसके बावजूद भारत में लाखों बच्चे फर्जी जन्मतिथि डालकर इंस्टाग्राम और स्नैपचैट का इस्तेमाल कर रहे हैं.
- 5 से 8 साल के बच्चे: इस श्रेणी के बच्चे मुख्य रूप से यूट्यूब पर कार्टून और गेमिंग वीडियो के आदी हो गए हैं, जिसके कारण उनका स्क्रीन टाइम लगातार बढ़ रहा है.
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पढ़ाई और मानसिक एकाग्रता पर बुरा असर
भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने आधिकारिक तौर पर बच्चों के गिरते शैक्षिक स्तर के लिए ‘डिजिटल लत’ को जिम्मेदार ठहराया है. इसके मुख्य प्रभाव इस प्रकार हैं.
- कम एकाग्रता: छोटी रील और शॉर्ट्स देखने के कारण बच्चों का ‘ध्यान अवधि’ कुछ सेकंड तक कम हो गई है. वे लंबी किताबें पढ़ने या कक्षा में ध्यान देने में असमर्थ होते जा रहे हैं.
- कमजोर अवधारण: सोशल मीडिया एल्गोरिदम लगातार नई सामग्री पेश करते हैं. इससे दिमाग थक जाता है और बच्चे पढ़ी हुई पुरानी बातें जल्दी भूल जाते हैं.
- स्लीप डेट: देर रात तक स्क्रीन देखने के कारण बच्चों में ‘स्लीप डेट’ की समस्या बढ़ रही है, जिसके कारण वे सुबह स्कूल में थकान और चिड़चिड़ापन महसूस करते हैं.

लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर गंभीर प्रभाव
बिना पलक झपकाए घंटों सोशल मीडिया स्क्रॉल करने से बच्चों की आंखों को अपूरणीय क्षति हो रही है.
- डिजिटल आई स्ट्रेन: बच्चों में सूखी आंखें, जलन और बार-बार सिरदर्द होना आम समस्या बन गई है.
- स्यूडोमायोपिया और चश्मे के बढ़ते नंबर: लगातार स्क्रीन को करीब से देखने के कारण भारत के शहरी बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) के मामले तेजी से बढ़े हैं, जिसके कारण कम उम्र में ही उन्हें मोटा चश्मा लग रहा है.
- नीली रोशनी का खतरा: स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी आंखों की रेटिना को नुकसान पहुंचाती है और मेलाटोनिन हार्मोन को बाधित करती है, जिससे बच्चों का प्राकृतिक नींद चक्र पूरी तरह से बाधित हो जाता है.
अश्लील सामग्री से समाज और परिवार में तनाव
बच्चों की इंटरनेट तक अनियंत्रित पहुंच अनजाने में उन्हें अश्लील या उम्र अनुचित सामग्री के संपर्क में ला रही है. इसका पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर पड़ रहा है.
- व्यवहार में बदलाव: ऐसे कंटेंट देखने के बाद कम उम्र में ही बच्चों में आक्रामकता और वयस्कों जैसा व्यवहार देखा जा रहा है. वे बातें छिपाना और अपने माता-पिता से झूठ बोलना शुरू कर देते हैं.
- पारिवारिक संवाद खत्म: कहानियां सुनने और दादा-दादी या माता-पिता से बात करने की बजाय बच्चे मोबाइल फोन में खोए रहते हैं. जब माता-पिता फोन छीन लेते हैं तो बच्चे हिंसक और विद्रोही हो जाते हैं, जिससे घर में आए दिन तनाव का माहौल रहता है.
- विकृत मानसिकता: अश्लील और हिंसक सामग्री बच्चों में महिलाओं और रिश्तों को लेकर गलत धारणाएं विकसित कर रही है, जो भविष्य में सामाजिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन रही है.
क्या बच्चे अपराध की ओर बढ़ रहे हैं? (NCRB के चौंकाने वाले आंकड़े)
सोशल मीडिया का दुरुपयोग न सिर्फ बच्चों को अपराध का शिकार बना रहा है बल्कि उन्हें बाल अपराधी भी बना रहा है.
मई 2026 में जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बच्चों के खिलाफ साइबर अपराधों में भारी वृद्धि हुई है.
- यौन शोषण और साइबर अपराध: बच्चों के खिलाफ हर 10 में से लगभग 9 साइबर अपराध (90%) सीधे तौर पर अश्लील और यौन सामग्री के प्रसार से जुड़े होते हैं.
- अपराध में संलिप्तता: सोशल मीडिया, अश्लील ग्रुप या सट्टेबाजी ऐप्स पर ‘डार्क वेब’ के संपर्क में आकर किशोर स्वयं साइबर बुलिंग, डीपफेक वीडियो बनाना, ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग और वित्तीय धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराधों में शामिल हो रहे हैं.
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भारत सरकार के कदम और नए कानून (2026)
बढ़ते संकट को देखते हुए भारत सरकार और राज्य सरकारें अब सख्त कदम उठा रही हैं.
- आयु सीमा और सख्त नियम (ड्राफ्ट आईटी नियम 2026): भारत सरकार ‘ड्राफ्ट आईटी (डिजिटल कोड) नियम 2026’ पर काम कर रही है. इसके तहत इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म के लिए सरकारी आईडी के जरिए सख्त आयु सत्यापन प्रणाली को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव है.
- राज्यों द्वारा सख्त फैसले: मार्च 2026 में कर्नाटक 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की घोषणा करने वाला देश का पहला राज्य बन गया. इसके तुरंत बाद, आंध्र प्रदेश और गोवा ने भी क्रमशः 13 और 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए समान प्रतिबंधों और नियमों की रूपरेखा तैयार की.
- निगरानी प्रणाली: केंद्र सरकार ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए विशेष रूप से ‘राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल’ (NCRP) और ‘भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र’ को सक्रिय किया है.
- स्कूलों के लिए दिशानिर्देश: सीबीएसई और शिक्षा मंत्रालय ने स्कूलों में ‘प्रज्ञाता’ ढांचे को लागू किया है, जो बच्चों के स्क्रीन समय को सीमित करने और सुरक्षित इंटरनेट उपयोग को बढ़ावा देने के निर्देश प्रदान करता है.
वैश्विक स्थिति: दुनिया के किन देशों ने लगाए प्रतिबंध?
ऑस्ट्रेलिया: 16 साल से कम उम्र के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध. तकनीकी कंपनियों पर उल्लंघन के लिए 4 करोड़ 95 लाख ऑस्ट्रेलियन डॉलर तक का जुर्माना लगाया गया.
नॉर्वे: विधेयक में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है.
ब्राजील: 16 साल से कम उम्र के बच्चों के खाते उनके माता-पिता से जुड़े होने चाहिए. ‘अनंत स्क्रॉल’ जैसी व्यसनी सुविधाओं पर प्रतिबंध.
चीन: बच्चों के फोन पर समय और ऐप के उपयोग की सीमा (उम्र के आधार पर स्क्रीन टाइम लॉक).
इंडोनेशिया: मार्च 2026 से हाई रिस्क प्लेटफॉर्म (टिकटॉक, इंस्टाग्राम) पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट धीरे-धीरे बंद किए जा रहे हैं.
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गांवों में बढ़ा क्रेज, शहरों में लत
सोशल मीडिया का मायाजाल आज के बच्चों के मानसिक विकास पर तेजी से असर डाल रहा है. एक ताजा विश्लेषण के मुताबिक शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों के बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. इंटरनेट तक आसान पहुंच और शहरी इलाकों में एकल परिवार संस्कृति के कारण बच्चे स्क्रीन पर अधिक समय बिता रहे हैं. वहीं, गांवों में स्मार्टफोन की उपलब्धता और सस्ते डेटा ने तस्वीर बदल दी है. ग्रामीण बच्चे अब पारंपरिक खेलों को छोड़कर रील और ऑनलाइन गेम खेलने में घंटों समय बिता रहे हैं, जिससे वहां इसका प्रभाव तेजी से फैल रहा है.
बदल रहा बच्चों का व्यवहार
इस डिजिटल लत का सबसे गंभीर असर बच्चों के व्यवहार पर पड़ता है. जब माता-पिता बच्चों को सोशल मीडिया या फोन का इस्तेमाल करने से मना करते हैं तो बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा और आक्रामक व्यवहार देखने को मिलता है. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, जब बच्चे स्क्रीन से दूर रहते हैं तो उनमें ‘डोपामाइन विदड्रॉल’ के लक्षण दिखाई देते हैं, जो उनके स्वभाव को जिद्दी बना रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को इस लत से बचाने के लिए सिर्फ प्रतिबंध लगाना ही काफी नहीं है. माता-पिता को उनके साथ समय बिताना होगा और उन्हें बाहरी गतिविधियों के लिए प्रेरित करना होगा.
डिजिटल पैरेंटिंग की आवश्यकता
अकेले सरकारी कानून सोशल मीडिया के इस जाल को नहीं तोड़ सकते. विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए समाज में ‘डिजिटल पेरेंटिंग’ को अपनाना होगा. माता-पिता को स्वयं अपने बच्चों के सामने मोबाइल फोन का उपयोग सीमित करना चाहिए. बच्चों को वर्चुअल रील्स की दुनिया से निकालकर आउटडोर खेल, सामाजिक मेलजोल और रचनात्मक शौक (जैसे पेंटिंग, पढ़ना, संगीत) की ओर मोड़ना बहुत जरूरी है.
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