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वैश्विक शांति के लिए महाशक्तियां बनी चुनौती?

by Live India
वैश्विक शांति के लिए महाशक्तियां बनी चुनौती?

वैश्विक शांति: सन् 1800 के बाद दुनियाभर में 37 मिलियन से ज्यादा लोग युद्ध लड़ते हुए मारे गए. यदि अगर आम लोगों को जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा कई अधिक बड़ा हो जाएगा. युद्ध कई दफा दूसरे तरीकों से भी भयानक साबित होते हैं. वे लोगों की जिंदगी को असुरक्षित बनाते हैं और उनके जीवन स्तर को भी खतरे में डाल देते हैं. साथ ही पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाने का काम करते हैं. हालांकि, 21वीं सदी में अभी तक छद्म युद्ध ही हो रहे हैं और दुनिया में कोई भी महाशक्ति आपस में प्रत्यक्ष युद्ध लड़ने से बचती हुई दिख रही हैं. इस सदी में दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां पर विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास ने लोगों के जीवन स्तर को अलग तरह से प्रभावित किया है. साथ ही युद्ध, हथियारों की होड़ और वैश्विक तनाव ने भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं भी खड़ी की हैं.

वहीं, शीत युद्ध खत्म होने के बाद इस बात की उम्मीद की जा रही थी कि अब विश्व में शांति स्थापित हो जाएगी. लेकिन अमेरिका, चीन और रूस के बीच लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने एक बार इस चिंता को बढ़ा दिया है कि दुनिया में अस्थिरता और जंग इतनी आसानी से रुकने वाली नहीं है. वर्तमान में ईरान और अमेरिका-इजरायल, रूस-यूक्रेन, इजरायल-लेबनान और इजरायल-हिजबुल्लाह के बीच में जंग जारी है. इन युद्धों में शामिल देशों को कहीं न कहीं अमेरिका, चीन और रूस मदद कर रहे हैं. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक बार फिर से तनावपूर्ण बना दिया है.

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नई वैश्विक शक्ति-संघर्ष की शुरुआत

विश्व राजनीति में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा कोई नई घटना नहीं है. इतिहास में विभिन्न साम्राज्यों और शक्तिशाली देशों के बीच में हमेशा टकराव होते आए हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में दो महाशक्तियां अमेरिका और सोवियत संघ उभर कर आईं. एक पूंजीवादी और दूसरा साम्यवाद विचारधारा को फॉलो करता था. साथ ही दोनों ही अपने-अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहते थे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण वियतनाम, कोरिया युद्ध और फिर बाद में क्यूबा मिसाइल संकट के रूप में उभर कर आया. उस वक्त दुनिया दो हिस्सों में बंट गई थी. यही वजह रही कि पांचवें दशक में आजाद हुए देश अपनी देश की गरीबी और भुखमरी का समाधान निकालने के लिए इन दोनों ही देशों की तरफ रुख कर रहे थे. हालांकि, तीसरी दुनिया के देशों ने गुटनिरपेक्ष बनाकर अपने लिए एक नया मंच तैयार किया और इस संगठन से जुड़ने वाले देश अमेरिका और सोवियत संघ किसी की गोद में जाकर नहीं बैठे. गुटनिरपेक्ष देशों अपनी समस्याओं का समाधान निकालने के लिए दोनों ही देशों संपर्क किया और विकास करने के लिए तकनीक और अनाज आयात किया. हालांकि, इसके बाद भी अमेरिका और सोवियत संघ अपने प्रभाव बढ़ाने के लिए लगातार कोशिश करते रहे और उनके सामने शर्तों रखने की कोशिश करते रहे. दोनों देशों के बीच में जारी शीत युद्ध साल 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद खत्म हो गया. इसके बाद दुनिया में एक ही महाशक्ति बची थी और वह सिर्फ अमेरिका थी.

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एकछत्र राज के बाद भी सत्ता अस्थिर की

सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका ने दुनिया में मौजूद देशों के विकास पर ध्यान नहीं दिया बल्कि वहां पर चुनी सरकारों को अस्थिर करने में लगा रहा. कई देशों में उसने सत्ता परिवर्तन करने की भी कोशिश की, जिसमें सबसे बड़ा उदाहरण चिली में अलेंदे सरकार का तख्ता पलट करना शामिल है. इसके बाद उसने कई देशों की सरकारों अस्थिर करने की कोशिश की. इसी बीच चीन लगातार अपनी आर्थिक शक्ति को बढ़ाता रहा. अब बीते एक दशक में चीन ने जिस तरह से साइंस, टेक्नोलॉजी, रिसर्च, AI और स्पेस के क्षेत्र में काम किया है वह अद्भुत है. अमेरिका के सामने आज कोई देश सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है तो वह सिर्फ चीन है. हालांकि, पुतिन के नेतृत्व में आगे बढ़े रूस ने भी तीसरा मोर्चा तैनात किया है. तीनों ही देश परमाणु संपन्न देश है. ऐसे में लोगों को इस बात चिंता सताती रहती है कि अगर इन तीनों देशों में जिस दिन सीधी जंग हो गई तो उस दौरान मानवता का क्या होगा? वर्तमान में रूस के पास इतने भारी संख्या में परमाणु बम है कि वह अकेला पूरी दुनिया का सर्वनाश कर सकता है. फिलहाल, ये तीनों महाशक्तियां अभी तक प्रत्यक्ष रूप से युद्ध के मैदान में नहीं आई है और लगातार बचने की भी कोशिश करती रहती हैं. रूस अभी यूक्रेन के साथ युद्ध में है और अमेरिका इस जंग में सीधी लड़ाई नहीं कर रहा है वह सिर्फ उसे आर्थिक और हथियारों की मदद मुहैया करा रहा है.

चीन, रूस और अमेरिका बने पावर सेंटर

आपको बताते चलें कि अमेरिका लंबे समय से विश्व की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति के रूप में बना हुआ है. दूसरी तरफ चीन की आर्थिक प्रगति और तकनीकी विकास ने उसको भी एशिया में एक पावर सेंटर के रूप में स्थापित किया है. इसके अलावा रूस कभी सोवियत संघ का हिस्सा था, अपनी सैन्य शक्ति और सामरिक प्रभाव को बनाए रखने के लिए लगातार काम कर रहा है. यह रेस सिर्फ सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं है बल्कि AI, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान, सेमीकंडक्टर तकनीक, ऊर्जा संसाधन और वैश्विक व्यापार भी प्रतियोगिता के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुके हैं. साथ ही इन सभी सेक्टरों में एक मुश्त होकर चीन लगातार आगे बढ़ रहा है और वह इसको अपनी शक्ति के रूप में भी प्रदर्शित कर रहा है. साथ ही अगर चीन आने वाले समय में अमेरिका को पछाड़ देता है तो वह भारत के लिए चुनौती बन कर खड़ा हो सकता है. एशिया में उसको सबसे ज्यादा चुनौती भारत की तरफ से मिल सकती है और सीमा विवाद भी दोनों के बीच में टकराव पैदा कर सकता है. ऐसे में अगर चीन अपनी शक्ति को बढ़ा रहा है तो भारत को भी इस ओर ध्यान देना होगा.

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परमाणु बनेगा मानवता के लिए खतरा

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर गिराए गए परमाणु बमों ने यह बता दिया था कि परमाणु हथियार कितने विनाशकारी हो सकते हैं. इसके बाद कई देशों ने परमाणु भंडार विकसित किए हैं और वर्तमान की स्थिति को ध्यान में रखते हुए कई देशों संकेत दे दिया है कि वह भी इस ओर भविष्य में बढ़ सकते हैं. इसके अलावा पहले के मुकाबले आज के समय में परमाणु बम सटीक, तेज और घातक हो चुके हैं. दूसरी तरफ विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी शक्तिशाली परमाणु बम संघर्ष की शुरुआत होती है तो उसका प्रभाव केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आसपास के देशों की लोगों को भारी नुकसान पहुंचाएगा. परमाणु बम की स्थिति में बड़े शहर नष्ट हो सकते हैं और स्वास्थ्य व्यवस्था को भी नुकसान होगा. वैश्विक तापमान में गिरावट और खाद्य उत्पादन में भारी कमी आ सकती है.

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शांति के लिए बड़ी चुनौतियां

विश्व स्तर की संस्थाएं और दुनिया भर के देश शांति और स्थिरता की बात दोहराते रहते हैं. लेकिन वास्तविकता में शांति के लिए सबसे बड़ी चुनौती वह ही खड़ी करते रहते हैं. राजनीतिक हित, आर्थिक चुनौतियां, राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा विवाद अक्सर संघर्षों को जन्म देते रहते हैं. हालांकि, इसके बाद भी बीते सात दशक में कोई बड़ी लड़ाई नहीं हुई है जिसके कारण पूरी दुनिया प्रभावित हो जाए. लेकिन ईरान पर हमला करने के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से मालवाहक जहाजों की आवाजाही पर लगी रोक के बाद दुनिया भर के देशों में ऊर्जा संकट जरूर गहराया है. फिर भी कोई अस्थिरता नहीं देखी गई है जिसके कारण भुखमरी छा गई हो.

सैन्य जंग के अलावा आधुनिक युग में साइबर युद्ध, सूचना युद्ध और तकनीकी प्रतिस्पर्धा की अब जंग में नए आयाम जुड़ गए हैं. अब युद्ध सिर्फ जमीन पर नहीं लड़ा जाता है बल्कि इंटरनेट भी एक जंग का मैदान बन गया है. ऐसे में शांति स्थापित करने के लिए सिर्फ युद्धविराम पर्याप्त नहीं है बल्कि संवाद, विश्वास, कूटनीतिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका भी है.

महाशक्तियाँ वैश्विक शांति के लिए चुनौती बन गईं

आम लोगों की पीड़ा कोई नहीं समझता

दुनिया भर में युद्ध की चर्चा सिर्फ सैन्य रणनीति, राजनीतिक फैसलों और भू-राजनीतिक संदर्भ में ही देखी जाती है. लेकिन कभी भी आम जन की नजर से उसको नहीं देखा जाता है. जब संघर्ष की शुरुआत होती है तो आम जन जीवन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है और सबसे पहले उन्हें खाद्य संकट का सामना करना पड़ता है. इसके अलावा लाखों लोग अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं और शरणार्थी बन जाते हैं. परिवार बिखर जाते हैं और बच्चों की शिक्षा तबाह हो जाती है. वहीं, युद्ध क्षेत्रों में रहने वाले लोग लगातार भय और असुरक्षा के माहौल में जीवन बिताते हैं. साथ ही स्वच्छ पानी और चिकित्सा सुविधाओं की कमी उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाती है. कई बार जब युद्ध समाप्त हो जाता है उसके कई वर्षों बाद भी उसका प्रभाव खत्म नहीं हो जाता है. आम लोग कई चुनौतियों का सामना करते रहते हैं. खासकर महिलाएं और बच्चे युद्ध के दौरान सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं. उन्हें विस्थापन, हिंसा, गरीबी और मानसिक आघात जैसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. युद्ध केवल जीवन नहीं छीनता, बल्कि लोगों के सपनों, अवसरों और भविष्य को भी प्रभावित करता है.

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