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UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला आरक्षण विधेयक अब सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनता जा रहा है.
यूपी की राजनीति: उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला आरक्षण विधेयक अब सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनता जा रहा है. 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों ही आधी आबादी को साधने के लिए अपने-अपने नैरेटिव के साथ मैदान में उतर चुकी हैं. भाजपा जहां इसे महिला सम्मान और अधिकार से जोड़कर बड़े जनसंपर्क अभियान की तैयारी में है, वहीं समाजवादी पार्टी इसे पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जोड़कर काउंटर रणनीति बना रही है.
बीजेपी का फोकस, नारी सम्मान और गांव-गांव संपर्क
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर भाजपा उत्तर प्रदेश में व्यापक अभियान चलाने की तैयारी में है. पार्टी महिला मोर्चा और संगठन के कार्यकर्ताओं के जरिए गांव-गांव जाकर इस मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाने की रणनीति बना रही है. बीजेपी का आरोप है कि संसद में महिला आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष ने विरोध किया, जिसे देशभर की महिलाओं ने देखा. बीजेपी प्रवक्ता हीरो बाजपेई का कहना है कि पार्टी एक कैडर आधारित संगठन है और उसके पास मजबूत महिला नेतृत्व है, जो जनता के बीच जाकर विपक्ष की भूमिका को उजागर करेगा.
सपा ने भी कसी कमर
बाजपेई कहते हैं कि पार्टी इस पूरे मुद्दे को नारी सम्मान बनाम विपक्ष का विरोध के रूप में स्थापित करने में जुटी है, जिससे महिला मतदाताओं को सीधे जोड़ा जा सके. वहीं समाजवादी पार्टी भी इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाए हुए है. सपा महिला आरक्षण को सामाजिक न्याय और समान हिस्सेदारी के नजरिए से जनता के बीच ले जाने की तैयारी कर रही है. सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद का कहना है कि भाजपा पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देना चाहती. सपा का दावा है कि महिला आरक्षण में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए. सपा इस मुद्दे को समान प्रतिनिधित्व बनाम भाजपा की राजनीति के रूप में पेश कर रही है, जिससे पीडीए समीकरण को मजबूत किया जा सके.
महिला वोट बैंक बना राजनीति का नया केंद्र
उत्तर प्रदेश में महिला मतदाता अब चुनावी राजनीति की धुरी बन चुकी हैं. राज्य में 7 करोड़ से अधिक महिला मतदाता हैं. कई सीटों पर पुरुषों से ज्यादा महिला वोटिंग हुई है तो 2022 विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड महिला भागीदारी रही है. भाजपा जहां लाभार्थी योजनाओं के जरिए इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना चाहती है, वहीं सपा सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी के मुद्दे पर सेंध लगाने की कोशिश में है. महिला आरक्षण विधेयक अब सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्रीय नैरेटिव बन चुका है. भाजपा इसे महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बना रही है, जबकि विपक्ष इसे अधूरा प्रतिनिधित्व बताकर चुनौती दे रहा है. साफ है कि 2027 की लड़ाई में आधी आबादी सबसे बड़ा फैक्टर बनने जा रही है. अब देखना होगा कि महिला वोट बैंक किसके पक्ष में जाता है और किसकी सियासत रणनीति चुनावी मैदान में भारी पड़ती है.
