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सफ़ाई कर्मचारी की मृत्यु: अगर एक दिन घर में साफ-सफाई नहीं होती तो अगले दिन हमारा वहां रहने का मन नहीं करता. इसी तरह अगर शहरों में बने सैप्टिक टैंक साफ न किए जाए, तो हमारा शहरों में रहना मुश्किल हो जाएगा. हम सभी को साफ-सफाई पसंद है, लेकिन गंदगी को साफ करने वालों को हम महत्वपूर्ण नहीं समझते. सैप्टिक टैंक और सीवर की सफाई करना एक ऐसा काम है जिसके बिना शहरों का सफाई सिस्टम एक दिन भी काम नहीं कर सकता. यह इतना खतरनाक काम है कि थोड़ी सी लापरवाही इंसान की जान ले लेती है. हर साल, सेप्टिक टैंक और सीवर साफ करते समय जहरीली गैसों के संपर्क में आने से कई मजदूरों की जान चली जाती है. ये मौतें किसी प्राकृतिक आपदा या दुर्घटना का नतीजा नहीं हैं, बल्कि सरकारी लापरवाही, सुरक्षा उपकरणों की कमी और कानूनों को ठीक से लागू न करने के दुखद नतीजे हैं.
कागजों पर तो सैप्टिक टैंक और सीवर की सफाई मशीनों से होती है, लेकिन आज भी कई जगहों पर मजदूरों को अपनी जान जोखिम में डालकर मैनहोल में उतरना पड़ता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि 2014 से 2025 तक देश भर में सेप्टिक टैंक और सीवर साफ करते समय 859 लोगों की मौत हो चुकी है. 859 लोगों ने हमारे लिए सफाई करते हुए अपनी जान गंवाई है. सोचिए, एक मजदूर जो रोजी-रोटी कमाने के लिए घर से निकलता है, जहरीली गैसों से भरे एक अंधेरे गड्ढे में कुछ ही मिनटों में मर जाता है और पीछे रह जाता है एक रोता-बिलखता गरीब परिवार. सबसे दुख की बात यह है कि जिन परिवारों ने अपने कमाने वाले को खो दिया है, उनमें से कुछ को आज तक सरकारी मुआवजा भी नहीं मिला है. सैप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई मौत का सबसे ताजा मामला आज गुजरात के सूरत से सामने आया है.
सूरत में 4 मजदूरों की मौत
गुजरात के सूरत में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान एक बड़ा हादसा हो गया. पुलिस के मुताबिक, एक ज्वैलरी फैक्ट्री यूनिट में सेप्टिक टैंक की सफाई लिए कुछ मजदूर काम कर रहे थे. चार लोग, एक सुपरवाइजर और तीन मजदूर सफाई के लिए टैंक में घुस गए. जहरीली गैस के असर से वे सब बेहोश हो गए और सभी की मौत हो गई. शुरुआती जांच में पता चला कि यह हादसा लापरवाही के कारण हुआ. सैप्टिक टैंक की सफाई के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया था. पुलिस अधीक्षक ने बताया कि अग्निशमन विभाग को फोन किया गया था और प्रारंभिक जांच से पता चलता है कि उनके पास कोई सुरक्षा उपकरण नहीं थे. घटना की सूचना मिलते ही दमकलकर्मी मौके पर पहुंचे और बचाव अभियान चलाते हुए चारों पीड़ितों को टैंक से बाहर निकाला. उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया, तब तक उनकी मौत हो चुकी थी.
इस तरह मौत के आंकड़ों में चार और लोगों का नाम जुड़ गया. अब एक नजर डालें भारत सरकार द्वारा जारी की रिपोर्ट पर जिसमें बताया गया है कि साल 2014 से अब तक कितने लोगों की मौत सैप्टिक टैंक और सीवर साफ करने के दौरान हुई.
2014 से अब तक 859 मौतें
फरवरी, 2026 को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा लोकसभा में पेश किए आंकड़ों के मुताबिक, साल 2014 से 2025 तक सैप्टिक टैंक और सीवर की सफाई के दौरान 859 लोगों की मौत हुई है. इसमें सबसे ज्यादा मौतें 2019 में हुई थी. इस साल 131 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. इसके बाद 2017 में 111 और 2022 में 88 मौतें दर्ज की गईं. सबसे कम 40 मौतें 2020 में हुईं. हालांकि पिछले कुछ सालों में मौतों की संख्या में कुछ कमी आई है, लेकिन 2023 में 65, 2024 में 54 और 2025 में 43 मौतें दर्ज की गईं, जो बताती हैं कि समस्या अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
मार्च, 2026 में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा लोकसभा में पेश की गई दूसरी रिपोर्ट में 2017 से अब तक हुई मौतों का राज्यवार ब्यौरा जारी किया गया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक 2017 से अब तक, देशभर में 622 लोगों की मौत सैप्टिक टैंक में सफाई के दौरान हुई है. वहीं, 52 परिवारों को अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला है. छह मामले बिना किसी समाधान के बंद कर दिए गए. राज्यों में सबसे ज्यादा 86 मौतें उत्तर प्रदेश में हुईं, इसके बाद महाराष्ट्र में 82, तमिलनाडु में 77, हरियाणा में 76, गुजरात में 73 और दिल्ली में 62 मौतें हुईं.
क्रम संख्याराज्य / केंद्र शासित प्रदेशकुल दर्ज मौतें1उत्तर प्रदेश862महाराष्ट्र823तमिलनाडु774हरियाणा765गुजरात736दिल्ली627कर्नाटक378पश्चिम बंगाल319पंजाब2510राजस्थान2011मध्य प्रदेश1712तेलंगाना1013आंध्र प्रदेश714बिहार515उत्तराखंड516ओडिशा417चंडीगढ़118गोवा119झारखंड120केरल121त्रिपुरा1कुल (Total)622
मौतों और मुआवजा पाने वाले परिवारों के बीच सबसे बड़ा अंतर उत्तर प्रदेश में देखा गया, जहां 86 में से 13 परिवारों को कोई आर्थिक मदद नहीं मिली और दो को सिर्फ थोड़ा-बहुत पेमेंट मिला. दिल्ली में 62 में से नौ परिवारों को कुछ नहीं मिला. गुजरात में, दो परिवारों को अभी तक मुआवजा नहीं मिला है और एक केस बंद कर दिया गया है. महाराष्ट्र में नौ परिवारों को कोई पेमेंट नहीं मिला. उत्तर प्रदेश के जिला-लेवल डेटा से पता चलता है कि चंदौली में चार मौतें हुईं, लेकिन कोई मुआवजा नहीं दिया गया. अंबेडकर नगर में दो मौतें हुईं और दोनों को कोई मुआवजा नहीं मिला. गौतम बुद्ध नगर में 16 मौतें हुईं, आठ मामलों में पूरा मुआवजा मिला, छह को कुछ नहीं मिला और दो केस बंद कर दिए गए.
सफाई के दौरान मौत होने का कारण
कानूनी तौर पर मशीनों का विकल्प होने के बावजूद, जब मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के सैप्टिक टैंक में उतरता हैं तो जहरीली गैस के संपर्क में आने के कारण उनकी मौत हो जाती है. सैप्टिक टैंक और सीवर के अंदर हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी खतरनाक गैस ज्यादा मात्रा में होती है. यह इंसान के सूंघने की क्षमता को खत्म कर देती है. जब कोई टैंक के अंदर जाता है तो यह गैस उसके फेफड़ों में चली जाती है और वह बेहोश हो जाता है. इसके अलावा ऑक्सीजन की कमी होने के कारण मजदूर का दम घुटने लगता है और वह बेहोश हो जाता है. इसके बाद शरीर ऑक्सीजन का इस्तेमाल नहीं कर पाता और मौत हो जाती है.
अक्सर, जब पहला व्यक्ति बिना किसी सेफ्टी इक्विपमेंट के अंदर जाता है और गैस के असर से बेहोश हो जाता है, तो बाहर खड़े उसके साथी उसे बचाने के लिए बिना कुछ सोचे-समझे तुरंत टैंक में कूद जाते हैं. उन्हें पता नहीं चलता कि अंदर जहरीली गैस है. उसे बचाने गए दूसरे और तीसरे लोग भी बेहोश हो जाते हैं और मर जाते हैं. इन मौतों को मुख्य कारण प्रशासन द्वारा सुरक्षा की अनदेखी है. 90 प्रतिशत मजदूर सफाई के दौरान कोई सुरक्षा गियर या पीपीई किट नहीं पहनते. कई मकान मालिक और ठेकेदार पेसै बचाने के चक्कर में दिहाड़ी मजदूरों को टैंक में उतार देते हैं.
भारत में गैर-कानूनी है मैनुअल क्लीनिंग
सरकर ने मैनुअल स्कैवेंजर (हाथ से मैला ढोना) के रूप में रोजगार का निषेध और उनका पुनर्वास एक्ट, 2013 में लागू किया था. इसके तहत गंदे टॉयलेट, खुली नालियों, रेलवे ट्रैक या सेप्टिक टैंक से इंसानी मल साफ करने या जबरदस्ती करवाना गैर-कानूनी है. कोई भी व्यक्ति या एजेंसी जो किसी दूसरे व्यक्ति को बिना सेफ्टी इक्विपमेंट के सीवर/सेप्टिक टैंक में हाथ से मैला उठाने या काम करने के लिए रखती है, उसे दो साल तक की जेल और ₹1 लाख तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
सरकार ने कहा कि 2023 में किए गए सर्वे में ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया, हालांकि, 2013 और 2018 में हुए दो पहले के सर्वे में 58,098 मैनुअल स्कैवेंजर की पहचान की गई थी, जिनमें से 32,473 अकेले उत्तर प्रदेश में थे, जो कुल संख्या का आधे से ज़्यादा है. सभी 58,098 लोगों और उनके परिवारों को एक बार में ₹40,000 की कैश मदद दी गई. 27,928 लोगों को स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग मिली. 2,679 लोगों को अपना बिजनेस शुरू करने के लिए ₹5 लाख तक की सब्सिडी दी गई.
सैनिटेशन वर्कर्स के लिए NAMASTE स्कीम
पिछले साल दिसंबर तक पहचाने गए कुल SSW में से, 73,864 (82.88 प्रतिशत) आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) या राज्य की हेल्थ स्कीम में एनरोल थे. रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल सफाई कर्मचारी कमीशन को 2025 में 842 शिकायतें मिलीं, जिनमें सैलरी न मिलना, सेफ्टी इक्विपमेंट की कमी और जाति के आधार पर भेदभाव जैसे मुद्दे शामिल थे. सबसे ज्यादा शिकायतें दिल्ली से 140 आईं, उसके बाद उत्तर प्रदेश से 130 और महाराष्ट्र से 95 शिकायतें आईं. कॉन्ट्रैक्टर या नगर निगम के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में, मंत्रालय ने कहा कि इनका डेटा सेंट्रल लेवल पर नहीं रखा जाता है, क्योंकि संविधान के सातवें शेड्यूल के तहत सफाई राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है.
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