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जी7 शिखर सम्मेलन 2026: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच फ्रांस की राजधानी पेरिस में जी7 शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है. इस बार के इस 52वें शिखर सम्मेलन को फ्रांस होस्ट कर रहा है. बता दें कि जब 1975 में इस ग्रुप की पहली बैठक हुई थी तब भी इसको होस्ट करने वाला देश फ्रांस ही था. प्रेसिडेंट इमैनुएल मैक्रों फ्रांस की ओर से इस ग्लोबल शिखर सम्मेलन (G7 Summit 2026) की अगुवाई कर रहे हैं. तय शेड्यूल के अनुसार, फ्रांस में जी7 के 52वें शिखर सम्मेलन का आयोजन 15 से 17 जून 2026 को किया जा रहा है.
विश्व की 7 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले इस समूह में अमेरिका, फ्रांस, यूनाइडेट किंगडम (ब्रिटेन), जर्मनी, कनाडा, इटली और जापान शामिल हैं. वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के स्पेशल निमंत्रण पर भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी7 में शामिल होने के लिए फ्रांस पहुंच चुके हैं. हालांकि, भारत इस समूह का सदस्य नहीं है.
इस बीच, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और विश्व के अन्य कई भू-राजनीतिक चहल-पहल के दौरान होने वाले इस ग्लोबल शिखर सम्मेलन पर दुनिया की निगाहें हैं. चीन सहित रूस और अन्य देश यह देखना चाहेंगे कि इस सम्मेलन के बाद संयुक्त बयान में क्या-क्या बातें कहीं जा रही हैं.
अब हम फ्रांस में होने जा रहे इस जी7 शिखर सम्मेलन के बीच इस ग्रुप के बारे में बात करेंगे. हम जानेंगे कि इसका इतिहास क्या रहा है. इसके साथ ही हम यह भी जानेंगे कि विश्व की 7 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले समूह का उद्देश्य और शक्ति (Power) क्या है. शुरुआत हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा और इस समिट में शामिल होने वाले इनके कार्यक्रम से करेंगे.

पीएम मोदी की फ्रांस यात्रा
शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के नीस पहुंचे. नीस कोट डी’अजूर एयरपोर्ट पर फ्रांस के शिक्षा मंत्री एडुआर्ड गेफ्रे, उच्च शिक्षा, अनुसंधान और अंतरिक्ष मंत्री फिलिप बैपटिस्ट, भारत में फ्रांस के राजदूत थियरी माथौ और नीस के मेयर एरिक सिओटी सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने उनका स्वागत किया. पीएम मोदी ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर फ्रांस पहुंचने के बाद लिखा, “नीस में उतरा. नीस के अलावा, इस फ्रांस यात्रा में एवियन और पेरिस में भी कार्यक्रम शामिल हैं. द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकें होंगी, जिनका उद्देश्य प्रमुख विकास साझेदारों के साथ भारत की मित्रता को मजबूत करना होगा.”
तय कार्यक्रमों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से बातचीत करेंगे. वहीं, वे जी7 शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित इनोवेशन केंद्रित महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल होंगे. पीएम मोदी ने शनिवार को एक्स पर जानकारी दी, “मैं कल राष्ट्रपति मैक्रों से मिलने और ‘भारत इनोवेट्स’ में उपस्थित होने के लिए उत्सुक हूं.” पांच दिनों की यात्रा के पहले चरण में, प्रधानमंत्री रविवार को मैक्रों के साथ द्विपक्षीय बैठक कर लिए हैं और फ्रांसीसी राष्ट्रपति के साथ ‘भारत इनोवेट्स’ का उद्घाटन का भी प्रोग्राम रहा. इस आयोजन में भारत, फ्रांस और अन्य देशों के शीर्ष इनोवेशन स्टार्टअप और वेंचर कैपिटल फंड एक साथ दिखें.
फ्रांस और स्लोवाकिया की अपनी एक सप्ताह की यात्रा से पहले पीएम मोदी ने कहा कि जी7 में भारत की उपस्थिति देश में उसके साझेदारों के भरोसे और उसकी बढ़ती वैश्विक छवि को दर्शाती है. फ्रांस से मोदी 14-15 जून को राजकीय यात्रा पर स्लोवाकिया जाएंगे, जहां वे ब्रातिस्लावा में राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी और प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको के साथ वार्ता करेंगे और व्यापारिक नेताओं के साथ बातचीत करेंगे.
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी 16-17 जून को एवियन में होने वाले जी7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए फ्रांस लौटेंगे. इस शिखर सम्मेलन में मोदी जी7 नेताओं और आमंत्रित सहयोगी देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग, आर्थिक विकास और एआई सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करेंगे. इसके अलावा, सम्मेलन के दौरान वे कई द्विपक्षीय बैठकें भी करेंगे. पीएम मोदी अपनी इस यात्रा के अंतिम चरण में 18 जून को पेरिस जाएंगे. वहां वे राष्ट्रपति मैक्रों के साथ यूरोप के सबसे बड़े प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप कार्यक्रम VivaTech 2026 में भाग लेंगे.
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जी7 का इतिहास
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने यह सभी को एहसास दिला दिया है कि हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं. ये आपस में व्यापार, लेन-देन आदि करते हैं. आर्थिक, पर्यावरण और सुरक्षा के क्षेत्रों में हमें रोज जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, वैसी ही चुनौतियों का सामना दुनिया भर के लाखों लोग भी करते हैं. कोई भी देश अकेले इनका समाधान नहीं कर सकता. हम सब मिलकर और आपसी तालमेल से ही इनके स्थायी समाधान ढूंढ पाते हैं.
इन्हीं सभी सोच के साथ सन् 1975 में G6 (जो अब G7 है) का गठन हुआ था. तब तेल के पहले संकट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर आर्थिक सहयोग की जरूरत को उजागर किया था. यह तेल संकट 1973 में आया था. इस ग्रुप के गठन के बाद पहला शिखर सम्मेलन फ्रांस के रामबौइलेट में हुआ था.

G7 देश हर साल शांति और सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और उसकी स्थिरता, विकास, पर्यावरण में बदलाव और नई तकनीकों जैसे अहम मुद्दों पर मिलकर काम करने के लिए बैठक करते हैं. इस बार का यह सालाना बैठक फ्रांस की अध्यक्षता में होने जा रहा है. यह शिखर सम्मेलन 15 से 17 जून को रूस के एवियन-लेस-बैंस शहर में आयोजित किया जा रहा है. यहां बता दें कि साल 1975 में जी6 का गठन हुआ था, लेकिन अगले साल ही यानी कि इसके गठन के एक साल बाद ही कनाडा भी इसका सदस्य हो गया, जिसके बाद जी6 से जी7 बन गया.
रूस आया और फिर चला भी गया
जानकारी के अनुसार, एक ऐसा समय था जब रूस भी इस ग्रुप का हिस्सा हुआ करता था. साल 1998 में रूस के शामिल होने से जी7 को जी8 कहा जाने लगा. लेकिन साल 2014 में रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया. इसके बाद अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश रूस के खिलाफ हो गए. रूस पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करने के भी आरोप लगे. इन सभी वजहों से रूस को जी8 से एक तरह से हटा दिया गया. उसके बाद जी8 फिर से जी7 हो गया.

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ग्रुप ऑफ 7 की रोटेटिंग प्रेसिडेंसी सिस्टम
G7 को ‘ग्रुप ऑफ 7’ कहते हैं. इनमें 7 देश कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका शामिल हैं. 1977 से ही यूरोपीय संघ G7 के कामकाज में पूरी तरह से शामिल रहा है. इसकी खासियत यह है कि इसका कोई कानूनी अस्तित्व, स्थायी सचिवालय या पदेन सदस्य नहीं हैं. इसका एकमात्र नियम यह है कि हर साल सात देशों में से कोई एक देश इसकी अध्यक्षता करता है. अध्यक्ष देश ही समूह के कामकाज के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराता है और अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं तय करता है. इस व्यवस्था को ‘रोटेटिंग प्रेसिडेंसी’ (बारी-बारी से अध्यक्षता) कहा जाता है.
G7 की ताकत इसका छोटा आकार और आपसी भरोसे का वह रिश्ता है जो सालों-साल बना है. इसी भरोसे की वजह से अलग-अलग देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख खुलकर और सीधे बातचीत कर पाते हैं, भले ही उनके बीच असहमति हो.
जी7 का उद्देश्य
जी7 के उद्देश्य की बात करें तो यह सदस्य देशों के अलावा विश्व में शांति, सहयोग और सुरक्षा के नजरिये से कई मुद्दों पर काम करता है. इस ग्लोबल मंच के प्रमुख उद्देश्यों में दुनिया के आर्थिक मुद्दे, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल सिक्योरिटी, साइबर सिक्योरिटी, ट्रेड, न्यू टेक्नोलॉजी की बढ़ोतरी और चुनौती समेत अन्य चीजें शामिल हैं.

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जी7 की शक्ति
जी7 की शक्ति की बात करें तो यह दुनिया के सबसे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों का एक ग्रुप है. इसमें अमेरिका के अलावा फ्रांस, यूनाइडेट किंगडम (ब्रिटेन), जर्मनी, कनाडा, इटली और जापान शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इन सातों देशों की कुल इकोनॉमी दुनिया की ग्लोबल इकोनॉमी का करीब 44 से 45 फीसदी है. यह ग्रुप दुनिया में बहुत बड़े परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है. इसके सदस्य देशों में ग्लोबल राजनीति के अलावा ग्लोबल शांति, सुरक्षा और सहयोग बनाने की बड़ी ताकत है.
इनमें से कई देश परमाणु संपन्न राष्ट्र भी हैं. रिपोर्ट (2026)के अनुसार, अमेरिका के पास 5042 परमाणु हथियार, फ्रांस के पास 370 परमाणु हथियार और ब्रिटेन के पास 225 परमाणु हथियार हैं. पूरे विश्व में इन देशों की सैन्य क्षमता भी काफी मजबूत है. दुनिया में किसी भी प्रकार की जंग या संघर्ष को शुरू करने या खत्म करने में इन देशों की अहम भूमिका होती है.

ताजा मामला आप देख सकते हैं कि अमेरिका के द्वारा ईरान पर हमले के बाद पश्चिम एशिया की क्या दुर्दशा हुई है. इसने कई देशों के लिए तेल और गैस के लिए प्रमुख समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बाधित कर दिया है, जिसकी वजह से भारत समेत दुनिया के कई देशों में एनर्जी सप्लाई में चुनौतियां देखी गई हैं. कई देशों में पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम बढ़ गए हैं. हालांकि, अब यह संघर्ष खत्म होता दिख रहा है, इसको खत्म करने में भी अमेरिका की बड़ी भूमिका है. जी7 कई बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन जैसे यूएन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व स्वास्थ्य संगठन में कई बार अपनी अहम भूमिका निभाते हुए दिखता है.
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