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ईरान के Chabahar Port की भारत में क्यों हो रही है चर्चा?

by Live India
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Chabahar Port: अमेरिका ने अपनी सैन्य कार्रवाई का दायरा बढ़ाते हुए ईरान के सबसे बड़े रणनीतिक पोर्ट ‘चाबहार’ पर हमला कर दिया. इस दौरान अमेरिका ने ईरान के करीब 90 ठिकानों पर हमला किया. साथ ही ईरान ने भी इन हमलों की पुष्टि की और बताया कि चाबहार समेत इन विस्फोटों में कई इलाकों की बिजली चली गई. अब इस हमले की चर्चा भारत में भी होने लगी है. यह हैरान कर देने वाला हमला समुद्री यातायात नियंत्रण टॉवर पर किया गया है. इस हमले में टावर को भारी नुकसान पहुंचा है. साथ ही चाबहार फ्री जोन का एक गोदाम भी क्षतिग्रस्त हो गया. ईरान ने दावा किया कि बुधवार और गुरुवार को हुए अमेरिकी हमले में उसके करीब 14 नागरिकों की मौत हो गई. दूसरी तरफ ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई में कुवैत, बहरीन और कतर में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर निशाना बनाकर हमले किए हैं. साथ ही कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि जॉर्डन और इराक में कई जगहों हमले किए गए हैं.

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क्यों है भारत के लिए चाबहार इतना महत्वपूर्ण?

चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से काफी अहम है. भारत ने साल 2017-18 से चाबहार पोर्ट पर निवेश करना शुरू किया था. हालांकि, भारत सरकार ने इस पोर्ट के लिए इस साल बजट में कोई राशि जारी नहीं की और इससे यह साफ होने लगा कि भारत अब इस पोर्ट से दूरी बनाने लगा है. पिछले साल बजट में मोदी सरकार ने चाबहार के लिए 400 करोड़ रुपए का प्रावधान किया था. साथ ही यह पहली बार था कि भारत सरकार ने इस साझा परियोजना के लिए कोई बजट में प्रावधान नहीं किया था. वहीं, जानकारों का मानना है कि पोर्ट से भारत का हाथ पीछे खींचने की बड़ी वजह अमेरिका का ईरान पर हमला और बदलती भू-राजनीतिक घटनाक्रम है. बीते दो सालों में ईरान वैश्विक स्तर पर थोड़ा अलग-थलग हुआ है और यह भी एक कारण है कि भारत ने यहां निवेश करने के लिए कदम आगे नहीं बढ़ाया. इसके अलावा अमेरिका के ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय अस्थिरता और बदलती हुई भू-राजनीतिक के कारण चाबहार की गति काफी धीमी रह गई. साथ ही अब मोदी सरकार की तरफ से फंड नहीं जारी करने की वजह से यह योजना ठप हो गई है.

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क्यों है भारत के लिए परियोजना इतनी अहम

बताया जाता है कि चाबहार पोर्ट में दो पार्ट है. पहला शाहिद कलंतरी और दूसरा शाहिद बहिश्ती है. यह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से बाहर होने की वजह से मालवाहक जहाजों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. साथ ही यह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से मात्र 170 किलोमीटर दूर है और यह रणनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण है. साथ ही यह पोर्ट ईरान के दक्षिण-पूर्वी सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है और यह वह समुद्री क्षेत्र है जिसे भारत लंबे समय से एक रणनीतिक वैकल्पिक मार्ग के रूप में देखता आ रहा है. इसके अलावा चाबहार इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के लिए काफी महत्वपूर्ण है. इस रूट के माध्यम से भारत की पहुंच काफी आसानी हो जाएगी. इस परियोजना से ईरान और रूस को भी सीधा फायदा मिलेगा. आपको बताते चलें कि साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान का दौरा किया था और 15 सालों में यह किसी प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी. उस वक्त यह उम्मीद जताई गई थी कि भारत नए सिरे से ईरान के साथ समझौता करना चाहता है. साथ ही दोनों देशो के बीच संबंधों को काफी ऊंचाईयों पर ले जाना चाहते हैं. इस दौरान मोदी ने भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच एक त्रिपक्षीय संबंधों को मजबूती देने के लिए इस परियोजना का प्लान दिया था. साथ ही इस परियोजना के लिए 55 करोड़ डॉलर निवेश करने का भी ऐलान किया था.

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बीते कुछ वर्षों में रहा उतार-चढ़ाव वाला माहौल

इसी बीच भू-राजनीतिक परिस्थितियों की वजह से भारत का इस परियोजना में इंट्रेस्ट काफी उतार-चढ़ाव भरा देखने को मिला. दूसरी तरफ भारत के लिए यह पोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान के रास्ते और मध्य एशिया के बाजारों से होते हुए यूरोप में भी पहुंच को बढ़ा रहा था. इस परियोजना को चीन-पाकिस्तान के आर्थिक गलियारे और ग्वादर पोर्ट के संतुलन के रूप में भी देखा जा रहा था. वहीं, भारत ने बंदरगाह के शाहिद बहिश्ती टर्मिनल के संचालन में हिस्सेदारी ली थी. इसका मकसद था कि अफगानिस्तान को आर्थिक और मानवीय सहायता डायरेक्ट पहुंचाई जा सकें. अमेरिका ने साल 2018 में भारत को इस परियोजना को पूरा करने के लिए छूट दी थी. हाल ही घटनाओं के बाद ट्रंप ने एक बार फिर से इस परियोजना पर प्रतिबंध लगा दिया है. ऐसे में भारत ने फिर से हाथ खींच लिया है. दिल्ली में जी-20 सम्मेलन के दौरान जब आर्थिक रूट को लेकर चर्चा हो रही थी तब भी इस परियोजना को लेकर सवाल खड़े हुए थे. साथ ही जब साल 2024 में भारत और ईरान के बीच इस परियोजना को लेकर अहम समझौता हुआ तो उस वक्त लगा कि ये पोर्ट अभी भारत के हाथों से गया नहीं है. बता दें कि बीते कुछ सालों में भारत ने इस पोर्ट के माध्यम से अफगानिस्तान में कई लाख टन अनाज भेजा है.

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क्या सच में है भारत पर अमेरिकी दबाव?

पिछले साल सितंबर में ईरान के चाबहार बंदरगाह पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था. हालांकि, भारत को अमेरिका ने छह महीने की छूट दे दी थी, ताकि वहां से सभी अधिकारी और इंजीनियर हट सकें. जानकारों का कहना है कि इस साल चाबहार बंदरगाह के लिए बजट में राशि का ऐलान नहीं करने का एक बड़ा कारण यह भी है कि अब अमेरिका ने इस पोर्ट को प्रतिबंध के दायरे में ला दिया है. अमेरिका ने भारत को दी छूट को वापस ले लिया है और भारत भी लगातार अमेरिका से नजदीकियों को ज्यादा तरजीह दे रहा है. ऐसे में मोदी सरकार किसी भी कीमत पर डोनाल्ड ट्रंप को असहज महसूस नहीं करवाना चाहती है. साथ ही भारत एक महाशक्ति को नाराज करने का रिस्क नहीं लेना चाहता है. अगर अमेरिका इस प्रतिबंध को हटाता है तो भारत इस परियोजना में जरूर निवेश करेगा और इससे जुड़ी परियोजनाओं पर भी काम फिर से शुरू कर देगा.

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सच में पीछे हटना चाहता है भारत?

कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भारत इस परियोजना से पीछे हट रहा है. अब इस साल के बजट में पोर्ट के लिए कोई धनराशि की घोषणा नहीं करने के बाद लग रह है कि भारत ने पल्ला झाड़ लिया है. वहीं, चाबहार को लेकर भारत ने अपने एक बयान में कहा था कि वह इस परियोजना पर काम आगे बढ़ाने के लिए ईरान के अलावा अमेरिका से भी संपर्क बनाए हुए है. वहीं, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि जैसा कि आप लोग इस बात को जानते हैं कि 28 अक्तूबर 2025 को अमेरिकी वित्त विभाग ने एक पत्र जारी किया था और इसमें 26 अप्रैल, 2026 तक छूट देने की बात कही गई थी. साथ ही हम इस परियोजना को अंतिम रूप देने के लिए लगातार अमेरिका के संपर्क में है. इसके अलावा ईरान के साथ हमारा संबंध काफी पुराना है. हम एक घटना पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं और जरूरत पड़ने पर हम इस परियोजना में दोबारा निवेश करने के लिए आगे बढ़ेंगे.

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पोर्ट का आगे क्या होगा?

अमेरिकी हमले और ईरान पर लगाए गए नए प्रतिबंधों के बाद भारत के लिए इस परियोजना को पूरा करने के लिए काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है. साथ ही इस परियोजना को पूरा करने के लिए भारत इसके सीधे संपर्क में नहीं रह सकता है और इस बीच दूसरे विकल्पों पर विचार भी कर सकता है. मौजूदा हमलों में भले ही इस पोर्ट को बड़ा नुकसान न पहुंचे, लेकिन कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से बड़ा नुकसान हो सकता है. वहीं, चाबहार के पास गहराता ये संकट इस परियोजना को अंधकार में ले जा सकता है और भारत की अरबों की परियोजना मिट्टी में मिल सकती है.

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