Home Latest News & Updates कितने अलग हैं सिद्धारमैया और शिवकुमार

कितने अलग हैं सिद्धारमैया और शिवकुमार

by Live India
Siddaramaiah and Shivakumar Journey

21

Siddaramaiah and Shivakumar Journey: लंबे समय से चल रही कर्नाटक की किच-किच अब खत्म हो गई है. कई बार मीटिंग करने के बाद कांग्रेस हाईकमान के निर्देशों का पालन करते हुए मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है. गुरुवार को उन्होंने राज्यपाल भवन में अपना इस्तीफा सौंपा और आज शुक्रवार को राज्यपाल ने उसे स्वीकार कर उन्हें कार्यवाहक सीएम घोषित कर दिया है. सिद्धारमैया कर्नाटक के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता बन गए हैं. करीब आठ साल और ग्यारह दिनों के कार्यकाल के साथ उन्होंने अपनी कुर्सी छोड़ी. अब उनके नए उत्तराधिकारी डीके शिवकुमार होंगे.

इस बदलाव का सबसे अहम पहलू यह है कि सिद्धारमैया ने अपना कार्यकाल पूरा होने से 2 साल पहले ही इस्तीफा दे दिया और अब अब कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार होंगे. इसका मुख्य कारण ढाई-ढाई साल की डील है या यूं कहें कि सिद्धारमैया और शिवकुमार ने आपस में कॉम्प्रोमाइज कर लिया. चलिए विस्तार से जानते हैं कि कर्नाटक में हुए इस बड़े बदलाव का कारण था, दोनों नेताओं का राजनीतिक सफर कैसा रहा और दोनों एक दूसरे से कितने अलग हैं.

क्या है ढाई-ढाई की डील

कांग्रेस ने मई 2023 का विधानसभा चुनाव सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की मिली-जुली लीडरशिप में लड़ा, लेकिन मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया. जब 13 मई, 2023 को नतीजे आए और कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिली, तो दोनों नेता मुख्यमंत्री पद पर अड़े रहे. सिद्धारमैया ने अपनी वरिष्ठता और जनता के सपोर्ट का हवाला दिया, जबकि डी.के. शिवकुमार ने राज्य अध्यक्ष के तौर पर जीत का क्रेडिट लिया और अपनी दावेदारी पेश की. इस रुकावट को दूर करने के लिए दोनों नेताओं को चुनाव के बाद दिल्ली बुलाया गया. कांग्रेस हाईकमान यानी राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ दोनों नेताओं की लंबी मीटिंग हुई, जिसमें हल निकला ढाई-ढाई साल का पॉवर शेयरिंग फॉर्मूला.

इसमें तय किया कि दोनों नेता ढाई-ढाई साल के लिए सीएम की कुर्सी पर बैठेंगे. 5 साल के कुल कार्यकाल में से पहले ढाई साल तक सिद्धारमैया मुख्यमंत्री रहेंगे और अगले ढाई साल के लिए डीके शिवकुमार सीएम बनेंगे. सिद्धारमैया ने पहले सीएम पद की शपथ ली और सत्ता का सुख भोगा. उनका ढाई साल का कार्यकाल नवंबर 2025 में खत्म हो गया. कुर्सी की डेडलाइन का समय आ गया, जिसके लिए डीके शिवकुमार बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. डी.के. शिवकुमार का साथ देने वाले विधायकों और मंत्रियों ने दिल्ली से बेंगलुरु तक दबाव बनाना शुरू कर दिया. उनका कहना था कि बदलाव का समय आ गया है, जैसा कि मई 2023 में दिल्ली में सीक्रेट मीटिंग में वादा किया गया था. नवंबर के आखिरी हफ्ते में यह झगड़ा बंद दरवाजों से बाहर निकलकर पूरी तरह पब्लिक हो गया. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को झगड़ा सुलझाने के लिए नवंबर के आखिर में दिल्ली में स्पेशल मीटिंग बुलानी पड़ी.

जब नवंबर-दिसंबर 2025 में मांग तेज हुई, तो सिद्धारमैया और उनके करीबी मंत्रियों ने शुरू में ऐसे किसी भी “लिखे हुए ढाई साल के फॉर्मूले” को मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने दावा किया कि वह पूरे पांच साल CM रहेंगे. शिवकुमार ने पार्टी पर दबाव बनाना शुरू किया. शिवकुमार गुट ने हाईकमान पर दबाव बनाया कि 2028 में अगले चुनाव की तैयारी के लिए उन्हें अभी से समय चाहिए. नवंबर में शुरू हुआ राजनीतिक संकट आखिरकार मई 2026 के आखिरी हफ्ते में खत्म हुआ, जब कांग्रेस हाईकमान ने सिद्धारमैया को इस्तीफा देने और शिवकुमार के लिए रास्ता बनाने के लिए मना लिया. इस तरह सिद्धारमैया ने इस्तीफा दिया और शिवकुमार को कुर्सी मिली. शिवकुमार ने भले ही ब्रेकफास्ट मीटिंग में सिद्धारमैया के पैर छूकर यह संदेश देने की कोशिश की वह उन्हें आदर्श मानते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे की पॉलिटिक्स भी सभी जानते हैं.

‘सत्ता छीननी पड़ती है’

डीके शिवकुमार अपना हक छीनना अच्छे से जानते हैं. यह पहला मौका नहीं है, जब उन्होंने अपना हक पाने के लिए राजनीतिक दांवपेच का इस्तेमाल किया हो. दिसंबर 2024 में शिवकुमार ने अपने मार्गदर्शक और पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा को श्रद्धांजलि देते हुए एक किस्सा सुनाया था और कहा था कि “सत्ता मिलती नहीं है, उसे छीनना पड़ता है”. उन्होंने बताया कि 1999 में, जब एस.एम. कृष्णा मुख्यमंत्री बनने वाले थे, तो शिवकुमार ने उनके साथ मिलकर मंत्रियों की लिस्ट तैयार की. इसे हाईकमान को भेजा गया और जब फाइनल लिस्ट जारी हुई, तो शिवकुमार का नाम उसमें नहीं था. तब शिवकुमार अपने ज्योतिषी के पास गए और उनसे सलाह ली. ज्योतिषी ने उनसे कहा कि जब तक दरवाजा खुद नहीं खोलोगे, तब तक मंत्री पद नहीं मिलेगा. शिवकुमार ने कहा- तब मुझे एहसास हुआ कि सत्ता मिलती नहीं है, छीननी पड़ती है.

शिवकुमार ने बिना समय गंवाए, आधी रात को एसएम कृष्णा को नींद से जगाया और अपना नाम मंत्रियों की लिस्ट में शामिल करवाया. उन्होंने मुख्यमंत्री की सीट पक्की करने में भी ऐसा ही पक्का इरादा दिखाया और हर दांव आजमाने के बाद, अब अपने विरोधी सिद्धारमैया की जगह लेने के लिए तैयार हैं.

27 साल की उम्र में विधानसभा पहुंचे

डीके शिवकुमार का जन्म 15 मई, 1962 को कनकपुरा के एक अमीर परिवार में हुआ था. उन्होंने 1980 के दशक में कांग्रेस पार्टी के जरिए एक छात्र नेता के तौर पर राजनीति में कदम रखा. 1985 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने देवेगौड़ा के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. इसके बाद 1989 में 27 साल की उम्र में वे सथानूर सीट से जीत गए. तब से वे लगातार 8 बार चुनाव जीत चुके हैं. उन्होंने 2008 से 2010 तक कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष का पद संभाला. इसके बाद 2020 से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर काम किया.

तिहाड़ जेल जाकर कीमत चुकाई

कर्नाटक के बाहर भी डीके शिवकुमार ने कांग्रेस को कई बार संकटों से बाहर निकाला है. इसलिए उन्हें पार्टी का ‘संकटमोचक’ तक कहा जाता है. 2017 के गुजरात चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने अहमद पटेल समेत 44 विधायकों को शिवकुमार की देखरेख में भेजा. शिवकुमार ने उन्हें अपने घर में रखा. यह प्लानिंग काम की और अहमद पटेल ने कांटे की टक्कर से चुनाव जीता. बाद में शिवकुमार के घर पर ईडी की रेड पड़ गई और 2019 में उन्हें 50 दिनों के लिए तिहाड़ जेल में रहना पड़ा. इस दौरान खुद सोनिया गांधी उनसे मिलने गई. शिवकुमार ने कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनने की इच्छा जताई. उन्होंने राज्य में पार्टी को फिर से सत्ता में लाने का वादा किया और इसे पूरा भी किया. शिवकुमार ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के साथ मिलकर 2023 में कांग्रेस को जीत दिलाई.

लेक्चरर रह चुके हैं सिद्धारमैया

सिद्धारमैया का जन्म 3 अगस्त, 1947 को मैसूर के पास सिद्धारमनहुंडी में हुआ था. वह कुरुबा समुदाय से हैं, जो कर्नाटक के जाति व्यवस्था में पारंपरिक रूप से हाशिए पर रहने वाला एक चरवाहा ग्रुप है. उन्होंने B.Sc. और L.L.B. की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने कुछ समय तक लेक्चरर के तौर पर काम भी किया. 1983 में सिद्धारमैया ने लोक दल के टिकट पर चामुंडेश्वरी असेंबली सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. 1994 में दोबारा चुनाव जीतने के बाद, वे एच.डी. देवेगौड़ा सरकार में वित्त मंत्री बने. इसके बाद 1996 में जे.एच. पटेल सरकार के दौरान उन्हें पहली बार डिप्टी सीएम बनाया गया. 2006 में, वे सोनिया गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस में शामिल हो गए. उसी साल, उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चामुंडेश्वरी उपचुनाव जीता. जब 2013 के चुनावों में कांग्रेस की पूरी बहुमत वाली सरकार बनी, तो वे पहली बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने. उन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया और 40 साल में कर्नाटक में कार्यकाल पूरा करने वाले पहले मुख्यमंत्री बने.

AHINDA आंदोलन बना टर्निंग प्वॉइंट

सिद्धारमैया अपने जोशीले भाषणों के लिए जाने जाते हैं. चुनौतियों को मौके में बदलने में माहिर, सिद्धारमैया ने JDS से निकाले जाने का इस्तेमाल कर्नाटक के पिछड़े समुदायों के बीच उभरने के लिए किया. सिद्धारमैया का JDS से निकाला जाना उनके लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. AHINDA सम्मेलन (अल्पसंख्यक, पिछड़ा और दलित) के जरिए उन्होंने अपनी छवि और पकड़ और ज्यादा मजबूत कर ली थी, जिसने कर्नाटक में सामाजिक न्याय का कॉन्सेप्ट पूरी तरह से बदल दिया. 2005 में सिद्धारमैया को निष्कासित कर दिया गया, लेकिन उन्होंने 2006 में कांग्रेस से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.

कितने अलग हैं दोनों नेता

कुल मिलाकर कहें तो, सिद्धारमैया कर्नाटक में बहुत लोकप्रिय नेता हैं, जिनकी कर्नाटक में पिछड़े वर्ग, दलितों और अल्पसंख्यकों (AHINDA) के बीच मजबूत पकड़ है और उन्हें जमीनी नेता के तौर पर जाना जाता है. वे अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही सोशलिस्ट विचारधारा से प्रेरित रहे हैं और पब्लिक वेलफेयर स्कीम पर फोकस करते हैं. सिद्धारमैया राज्य का बजट पेश करने में माहिर हैं और उन्हें एक कुशल और सख्त जननेता के तौर पर देखा जाता है.

कर्नाटक गर्वनर ने स्वीकार किया सिद्धारमैया का इस्तीफा, हाईकमान के साथ मीटिंग करेंगे शिवकुमार

Related Articles