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राजनीतिक समाचार: विपक्षी दलों में टूट-फूट की चर्चाएं तेज हैं. टीएमसी में बगावत हो गई, तो महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी नए संकट से जूझती दिख रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ये सिर्फ राजनीतिक घटनाक्रम हैं या फिर संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाने की किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा? आखिर मिशन 2029 के लिए बीजेपी की असली तैयारी क्या है?
क्या परिसीमन होगा पूरा
बीजेपी नेतृत्व को अंदाजा है कि 2029 का चुनाव 2024 से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है. ऐसे में दो बड़े मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं. पहला महिला आरक्षण और दूसरा परिसीमन. परिसीमन के जरिए न सिर्फ लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ सकती है, बल्कि संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं और जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व का ढांचा भी बदल सकता है. इसके उदाहरण जम्मू-कश्मीर और असम में देखे जा चुके हैं.
जम्मू क्षेत्र में 6 नई सीटें जोड़ी गईं
जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के बाद जम्मू क्षेत्र में 6 नई सीटें जोड़ी गईं, जिनमें से 5 सीटों पर बीजेपी को फायदा मिला. वहीं, असम में 2023 के परिसीमन के बाद राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की चर्चा रही. अब नजर उन राज्यों पर जहां 2024 में बीजेपी को सबसे ज्यादा राजनीतिक नुकसान हुआ था.
लोकसभा चुनाव 2024 में एनडीए को उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में सिर्फ 65 सीटें मिलीं, जबकि 105 सीटें विपक्ष के खाते में गईं. इसका मतलब है कि विपक्ष की ताकत का बड़ा हिस्सा इन्हीं राज्यों से आता है. इसी वजह से माना जा रहा है कि भविष्य के किसी भी परिसीमन या चुनावी पुनर्संतुलन का सबसे बड़ा असर इन्हीं राज्यों पर पड़ सकता है. इसके अलावा बिहार, झारखंड, हरियाणा और राजस्थान की वे 23 सीटें भी राजनीतिक रणनीति के केंद्र में बताई जा रही हैं, जिन्हें बीजेपी पिछली बार हार गई थी.
360 सांसदों का चाहिए समर्थन
लेकिन इस पूरी रणनीति की सबसे बड़ी शर्त है संसद में दो-तिहाई बहुमत. लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सांसदों का समर्थन चाहिए, जबकि राज्यसभा में यह आंकड़ा 163 का है. फिलहाल, एनडीए के पास लोकसभा में 293 सांसद हैं. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 सांसदों और उद्धव ठाकरे गुट के 7 सांसदों के अलग रुख अपनाने के बाद एनडीए का आंकड़ा करीब 320 तक पहुंच सकता है. इसके बावजूद लोकसभा में करीब 40 सांसदों की कमी बनी रहती है.
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राज्यसभा में एनडीए के पास फिलहाल 148 सदस्य हैं. झारखंड, मिजोरम और अन्य संभावित राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद यह संख्या 154 तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, लेकिन तब भी दो-तिहाई बहुमत से करीब 10 सीटें कम रहेंगी. यही वजह है कि महाराष्ट्र में शिवसेना की टूट, पश्चिम बंगाल में टीएमसी में टूट और अन्य क्षेत्रीय दलों के समीकरणों पर लगातार नजर रखी जा रही है. राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि तमिलनाडु की डीएमके और एम.के. स्टालिन की भूमिका भविष्य के किसी भी बड़े संवैधानिक समीकरण में निर्णायक हो सकती है. डीएमके के पास लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 10 सदस्य हैं. इसलिए उसका रुख बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. हालांकि, बीजेपी इस दल बदल को टूटने वाली पार्टियों का अंदरूनी मामला बताते हुए नज़र आ रही है.
क्या बीजेपी ने शुरू की 2029 की तैयारी?
यह कहानी सिर्फ दो-तिहाई बहुमत की नहीं है. कहानी 2029 की तैयारी, परिसीमन, महिला आरक्षण और नए चुनावी समीकरणों की है.
क्या संसद में संख्या जुटाने की कवायद भविष्य के बड़े संवैधानिक बदलावों का रास्ता खोलने के लिए है? क्या महाराष्ट्र से लेकर पश्चिम बंगाल तक चल रही राजनीतिक हलचल उसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे. लेकिन इतना तय है कि 2029 की लड़ाई की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो चुकी है.
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